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Rigveda Mandal 1 / Sukta 47 / Mantra 2

191 Sukta
10 Mantra
1/47/2
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- निचृत्सतः पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्रि॒व॒न्धु॒रेण॑ त्रि॒वृता॑ सु॒पेश॑सा॒ रथे॒ना या॑तमश्विना । कण्वा॑सो वां॒ ब्रह्म॑ कृण्वन्त्यध्व॒रे तेषां॒ सु शृ॑णुतं॒ हव॑म् ॥

त्रि॒ऽव॒न्धु॒रेण॑ । त्रि॒ऽवृता॑ । सु॒ऽपेश॑सा । रथे॑न । आ । या॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । कण्वा॑सः । वा॒म् । ब्रह्म॑ । कृ॒ण्व॒न्ति॒ । अ॒ध्व॒रे । तेषा॑म् । सु । शृ॒णु॒त॒म् । हव॑म् ॥

Mantra without Swara
त्रिवन्धुरेण त्रिवृता सुपेशसा रथेना यातमश्विना । कण्वासो वां ब्रह्म कृण्वन्त्यध्वरे तेषां सु शृणुतं हवम् ॥

त्रिवन्धुरेण । त्रिवृता । सुपेशसा । रथेन । आ । यातम् । अश्विना । कण्वासः । वाम् । ब्रह्म । कृण्वन्ति । अध्वरे । तेषाम् । सु । शृणुतम् । हवम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 2

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Meaning
हे (अश्विना) पावक और जल के तुल्य सभा और सेना के ईश ! तुम लोग जैसे (कण्वासः) बुद्धिमान् लोग (अध्वरे) अग्निहोत्रादि वा शिल्पक्रिया से सिद्ध यज्ञ में जिस (त्रिबन्धुरेण) तीन बन्धनयुक्त (त्रिवृता) तीन शिल्पक्रिया के प्रकारों से पूरित (सुपेशसा) उत्तम रूप वा सोने से जटित (रथेन) विमान आदि यान से देश देशान्तरों में शीघ्र जा आके (ब्रह्म) अन्नादि पदार्थों को (कृण्वन्ति) करते हैं वैसे उससे देश देशान्तर और द्वीपद्वीपान्तरों को (आयातम्) जाओ आओ (तेषाम्) उन बुद्धिमानों का (हवम्) ग्रहण करने योग्य विद्याओं के उपदेश को (शृणुतम्) सुनो और अन्नादि समृद्धि को बढ़ाया करो ॥२॥
Essence
यहां वाचकलुप्तोपमालंकार है। मनुष्यों को योग्य है कि विद्वानों के सङ्ग से पदार्थ विज्ञानपूर्वक यज्ञ और शिल्पविद्या की हस्तक्रिया को साक्षात् करके व्यवहाररूपी कार्यों को सिद्ध करें ॥२॥
Subject
उससे सिद्ध किये हुए यान से क्या करना चाहिये इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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