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Rigveda Mandal 1 / Sukta 46 / Mantra 8

191 Sukta
15 Mantra
1/46/8
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒रित्रं॑ वां दि॒वस्पृ॒थु ती॒र्थे सिन्धू॑नां॒ रथः॑ । धि॒या यु॑युज्र॒ इन्द॑वः ॥

अ॒रित्र॑म् । वा॒म् । दि॒वः । पृ॒थु । ती॒र्थे । सिन्धू॑नाम् । रथः॑ । धि॒या । यु॒यु॒ज्रे॒ । इन्द॑वः ॥

Mantra without Swara
अरित्रं वां दिवस्पृथु तीर्थे सिन्धूनां रथः । धिया युयुज्र इन्दवः ॥

अरित्रम् । वाम् । दिवः । पृथु । तीर्थे । सिन्धूनाम् । रथः । धिया । युयुज्रे । इन्दवः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 34 Mantra » 3

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Meaning
हे कारीगरो ! जो (वाम्) आप लोगों का (पृथु) विस्तृत (रथः) यानसमूह अर्थात् अनेकविध सवारी हैं उनको (सिंधूनाम्) समुद्रों के (तीर्थे) तराने वाले में (अरित्रम्) यान रोकने और बहुत जल के थाह ग्रहणार्थ लोहे का साधन (दिवः) प्रकाशमान बिजुली अग्न्यादि और (इन्दवः) जलादिको आप (युयुज्रे) युक्त कीजिये ॥८॥
Essence
कोई भी मनुष्य अग्नि आदि से जलनेवाले यान अर्थात् सवारी के विना पृथिवी समुद्र और अन्तरिक्ष में सुख से आने जाने को समर्थ नहीं हो सकता ॥८॥
Subject
फिर वह यान किस प्रकार का करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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