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Rigveda Mandal 1 / Sukta 46 / Mantra 3

191 Sukta
15 Mantra
1/46/3
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
व॒च्यन्ते॑ वां ककु॒हासो॑ जू॒र्णाया॒मधि॑ वि॒ष्टपि॑ । यद्वां॒ रथो॒ विभि॒ष्पता॑त् ॥

व॒च्यन्ते॑ । वा॒म् । क॒कु॒हासः॑ । जू॒र्णाया॑म् । अधि॑ । वि॒ष्टपि॑ । यत् । वा॒म् । रथः॑ । विऽभिः॑ । पता॑त् ॥

Mantra without Swara
वच्यन्ते वां ककुहासो जूर्णायामधि विष्टपि । यद्वां रथो विभिष्पतात् ॥

वच्यन्ते । वाम् । ककुहासः । जूर्णायाम् । अधि । विष्टपि । यत् । वाम् । रथः । विभिः । पतात्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 33 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे कारीगरो ! जो (जूर्णायां) वृद्धावस्था में वर्त्तमान (ककुहासः) बड़े विद्वान् (वाम्) तुम शिल्पविद्या पढ़ने-पढ़ाने वालों को विद्याओं का (वच्यन्ते) उपदेश करें तो (वाम्) आप लोगों का बनाया हुआ (रथः) विमानादि सवारी (विभिः) पक्षियों के तुल्य (विष्टपि) अन्तरिक्ष में (अधि) ऊपर (पतात्) चलें ॥३॥
Essence
जो मनुष्य लोग बड़े ज्ञानी के समीप से कारीगरी और शिक्षा को ग्रहण करें तो विमानादि सवारियों को रच के पक्षी के तुल्य आकाश में जाने आने को समर्थ होवें ॥३॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।