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Rigveda Mandal 1 / Sukta 46 / Mantra 15

191 Sukta
15 Mantra
1/46/15
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒भा पि॑बतमश्विनो॒भा नः॒ शर्म॑ यच्छतम् । अ॒वि॒द्रि॒याभि॑रू॒तिभिः॑ ॥

उ॒भा । पि॒ब॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । उ॒भा । नः॒ । शर्म॑ । य॒च्छ॒त॒म् । अ॒वि॒द्रि॒याभिः॑ । ऊ॒तिभिः॑ ॥

Mantra without Swara
उभा पिबतमश्विनोभा नः शर्म यच्छतम् । अविद्रियाभिरूतिभिः ॥

उभा । पिबतम् । अश्विना । उभा । नः । शर्म । यच्छतम् । अविद्रियाभिः । ऊतिभिः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 35 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
हे सभा और सेना के ईश ! (अश्विना) संपूर्ण विद्या और सुख में व्याप्त होनेवाले ! तुम दोनों अमृत रूप औषधियों के रस को (पिबतम्) पीओ और (उभा) दोनों (अविद्रियाभिः) अखण्डित क्रियायुक्त (ऊतिभिः) रक्षाओं से (नः) हमको (शर्म) सुख (यच्छतम्) देओ ॥१५॥
Essence
जो सभा और सेनापति आदि राजपुरुष प्रीति और विनय से प्रजा की पालना करें तो प्रजा भी उन की रक्षा अच्छे प्रकार करें ॥१५॥ इस सूक्त में उषा और अश्वियों का प्रत्यक्षार्थ वर्णन किया है इससे इस सूक्ताऽर्थ के साथ पूर्वसूक्तार्थ की संगति जाननी चाहिये ॥ यह पैंतीसवां वर्ग ३५ छयालीसवां ४६ सूक्त और ३ तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥४६॥ इति श्रीमत्परिव्राजकाचार्य्य महाविद्वान् श्रीयुत स्वामी विरजानन्द सरस्वतीजी के शिष्य दयानन्दसरस्वती स्वामी ने संस्कृत और आर्य्यभाषा से सुशोभित अच्छे प्रमाण सहित ऋग्वेदभाष्य के तीसरे अध्याय को पूर्ण किया ॥१५॥
Subject
फिर वे हम लोगों के लिये क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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