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Rigveda Mandal 1 / Sukta 46 / Mantra 14

191 Sukta
15 Mantra
1/46/14
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यु॒वोरु॒षा अनु॒ श्रियं॒ परि॑ज्मनोरु॒पाच॑रत् । ऋ॒ता व॑नथो अ॒क्तुभिः॑ ॥

यु॒वोः । उ॒षाः । अनु॑ । श्रिय॑म् । परि॑ऽज्मनोः । उ॒प॒ऽआच॑रत् । ऋ॒ता । व॒न॒थः॒ । अ॒क्तुऽभिः॑ ॥

Mantra without Swara
युवोरुषा अनु श्रियं परिज्मनोरुपाचरत् । ऋता वनथो अक्तुभिः ॥

युवोः । उषाः । अनु । श्रियम् । परिज्मनोः । उपआचरत् । ऋता । वनथः । अक्तुभिः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 35 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (ऋता) उचित् गुण सुन्दरस्वरूप ! सभासेनापति ! जैसे (उषाः) प्रभात समय (अक्त्तुभिः) रात्रियों के साथ (उपाचरत्) प्राप्त होता है वैसे जिन (परिज्मनोः) सर्वत्र गमन कर्त्ता पदार्थों को प्रकाश से फेंकने हारे सूर्य्य और चन्द्रमा के सदृश वर्त्तमान (युवोः) आपका न्याय और रक्षा हमको प्राप्त होवे आप (श्रियम्) उत्तम लक्ष्मी को (अनुवनथः) अनुकूलता से सेवन कीजिये ॥१४॥
Essence
राजा और प्रजाजनों को चाहिये कि परस्पर प्रीति से बड़े ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर सदा सबके उपकार में यत्न किया करें ॥१४॥
Subject
इन दोनों से क्या प्राप्त करें इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।