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Rigveda Mandal 1 / Sukta 46 / Mantra 11

191 Sukta
15 Mantra
1/46/11
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अभू॑दु पा॒रमेत॑वे॒ पन्था॑ ऋ॒तस्य॑ साधु॒या । अद॑र्शि॒ वि स्रु॒तिर्दि॒वः ॥

अभू॑त् । ऊँ॒ इति॑ । पा॒रम् । एत॑वे । पन्था॑ । ऋ॒तस्य॑ । सा॒धु॒ऽया । अद॑र्शि । वि । स्रु॒तिः । दि॒वः ॥

Mantra without Swara
अभूदु पारमेतवे पन्था ऋतस्य साधुया । अदर्शि वि स्रुतिर्दिवः ॥

अभूत् । ऊँ इति । पारम् । एतवे । पन्था । ऋतस्य । साधुया । अदर्शि । वि । स्रुतिः । दिवः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 35 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
मनुष्यों को योग्य है कि समुद्रादि के (पारम्) पार (एतवे) जाने के लिये जहां (दिवः) प्रकाशमान सूर्य्य और (ऋतस्य) जल का (विस्रुतिः) अनेक प्रकार गमनार्थ (पन्थाः) मार्ग (अभूत्) हो वहां स्थिर होके (साधुया) उत्तम सवारी से सुखपूर्वक देश देशान्तरों को (अदर्शि) देखें तो श्रीमन्त क्यों न होवें ॥११॥
Essence
मनुष्यों को उचित हैं कि सर्वत्र आने जाने के लिये सीधे और शुद्ध मार्गों को रच और विमानादि यानों से इच्छापूर्वक गमन करके नाना प्रकार के सुखों को प्राप्त करें ॥११॥
Subject
फिर उसी उत्तर का उपदेश अगले मन्त्र में करते हैं०।