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Rigveda Mandal 1 / Sukta 46 / Mantra 10

191 Sukta
15 Mantra
1/46/10
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अभू॑दु॒ भा उ॑ अं॒शवे॒ हिर॑ण्यं॒ प्रति॒ सूर्यः॑ । व्य॑ख्यज्जि॒ह्वयासि॑तः ॥

अभू॑त् । ऊँ॒ इति॑ । भाः । ऊँ॒ इति॑ । अं॒शवे॑ । हिर॑ण्यम् । प्रति॑ । सूर्यः॑ । वि । अ॒ख्य॒त् । जि॒ह्वया॑ । असि॑तः ॥

Mantra without Swara
अभूदु भा उ अंशवे हिरण्यं प्रति सूर्यः । व्यख्यज्जिह्वयासितः ॥

अभूत् । ऊँ इति । भाः । ऊँ इति । अंशवे । हिरण्यम् । प्रति । सूर्यः । वि । अख्यत् । जिह्वया । असितः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 34 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे कारीगरो ! तुम लोग जैसे (असितः) अबद्ध अर्थात् जिसका किसी के साथ बन्धन नहीं है (भाः) प्रकाशयुक्त (सूर्य्यः) सूर्य्य के (अंशवे) किरणों के विभागार्थ (जिह्वया) जीभ के समान (व्यख्यत्) प्रसिद्धता से प्रकाशमान सन्मुख (अभूत्) होता है वैसे उसी पर यान का स्थापन कर उसमें उचित स्थान में (हिरण्यम्) सुवर्णादि उत्तम पदार्थों को धरो ॥१०॥
Essence
हे सवारी पर चलने वाले मनुष्यो ! तुम दिशाओं के जाननेवाले चुम्बक ध्रुव यंत्र और सूर्यादि कारण से दिशाओं को जान यानों को चलाओ और ठहराया भी करो जिससे भ्रान्ति में पड़कर अन्यत्र गमन न हो, अर्थात् जहां जाना चाहते हो ठीक वहीं पहुँचो भटकना न हो ॥१०॥
Subject
इस विषय का उत्तर अगले मन्त्र मे कहा है।