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Rigveda Mandal 1 / Sukta 45 / Mantra 9

191 Sukta
10 Mantra
1/45/9
Devata- अग्निर्देवाः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्रा॒त॒र्याव्णः॑ सहस्कृत सोम॒पेया॑य सन्त्य । इ॒हाद्य दैव्यं॒ जनं॑ ब॒र्हिरा सा॑दया वसो ॥

प्रा॒तः॒ऽयाव्नः॑ । स॒हः॒ऽकृ॒त॒ । सो॒म॒ऽपेया॑य । स॒न्त्य॒ । इ॒ह । अ॒द्य । दैव्य॑म् । जन॑म् । ब॒र्हिः । आ । सा॒द॒य॒ । व॒सो॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
प्रातर्याव्णः सहस्कृत सोमपेयाय सन्त्य । इहाद्य दैव्यं जनं बर्हिरा सादया वसो ॥

प्रातःयाव्नः । सहःकृत । सोमपेयाय । सन्त्य । इह । अद्य । दैव्यम् । जनम् । बर्हिः । आ । सादय । वसो इति॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 32 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सहस्कृत) सबको सिद्ध करने (सन्त्य) जो संभजनीय क्रियाओं में कुशल विद्वानों में सज्जन (वसो) श्रेष्ठ गुणों में वसनेवाले विद्वान् ! तू (इह) इस विद्या व्यवहार में (अद्य) आज (सोमपेयाय) सोम रस के पीने के लिये (प्रातर्याव्णः) प्रातःकाल पुरुषार्थ को प्राप्त होनेवाले विद्वानों और (दैव्यम्) विद्वानों में कुशल (जनम्) पुरुषार्थ युक्त धार्मिक मनुष्य और (बर्हिः) उत्तम आसन को (आसादय) प्राप्त कर ॥९॥
Essence
जो मनुष्य उत्तम गुण युक्त मनुष्यों ही को उत्तम वस्तु देते हैं ऐसे मनुष्यों ही का संग सब लोग करें कोई भी मनुष्य विद्या वा पुरुषार्थ युक्त मनुष्यों के संग वा उपदेश के विना पवित्र गुण वस्तुओं और सुखों को प्राप्त नहीं हो सकता ॥९॥
Subject
इसके अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य किसके लिये क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।