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Rigveda Mandal 1 / Sukta 45 / Mantra 7

191 Sukta
10 Mantra
1/45/7
Devata- अग्निर्देवाः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
नि त्वा॒ होता॑रमृ॒त्विजं॑ दधि॒रे व॑सु॒वित्त॑मम् । श्रुत्क॑र्णं स॒प्रथ॑स्तमं॒ विप्रा॑ अग्ने॒ दिवि॑ष्टिषु ॥

नि । त्वा॒ । होता॑रम् । ऋ॒त्विज॑म् । द॒धि॒रे । व॒सु॒वित्ऽत॑मम् । श्रुत्ऽक॑र्णम् । स॒प्रथः॑ऽतमम् । विप्राः॑ । अ॒ग्ने॒ । दिवि॑ष्टिषु ॥

Mantra without Swara
नि त्वा होतारमृत्विजं दधिरे वसुवित्तमम् । श्रुत्कर्णं सप्रथस्तमं विप्रा अग्ने दिविष्टिषु ॥

नि । त्वा । होतारम् । ऋत्विजम् । दधिरे । वसुवित्तमम् । श्रुत्कर्णम् । सप्रथःतमम् । विप्राः । अग्ने । दिविष्टिषु॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 32 Mantra » 2

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Meaning
हे (अग्ने) बहुश्रुत सत्पुरुष ! जो (विप्राः) मेधावी विद्वान् लोग (दिविष्टिषु) पवित्र पठन पाठनरूप क्रियाओं में अग्नि के तुल्य जिस (होतारम्) ग्रहण कारक (ऋत्विजम्) ऋतुओं को संगत करने (श्रुत्कर्णम्) सब विद्याओं को सुनने (सप्रथस्तमम्) अत्यन्त विस्तार के साथ वर्त्तने (वसुवित्तमम्) पदार्थों को ठीक-२ जाननेवाले (त्वा) तुझको (निदधिरे) धारण करते हैं उनको तू भी धारण कर ॥७॥
Essence
जो मनुष्य उत्तम कार्य सिद्धि के लिये प्रयत्न करते और चक्रवर्त्ती राज्य श्री और विद्याधन की सिद्धि करने को समर्थ हो सकते हैं वे शोक को प्राप्त नहीं होते ॥७॥
Subject
फिर उस को किस प्रकार जानकर धारण करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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