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Rigveda Mandal 1 / Sukta 45 / Mantra 6

191 Sukta
10 Mantra
1/45/6
Devata- अग्निर्देवाः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
त्वां चि॑त्रश्रवस्तम॒ हव॑न्ते वि॒क्षु ज॒न्तवः॑ । शो॒चिष्के॑शं पुरुप्रि॒याग्ने॑ ह॒व्याय॒ वोळ्ह॑वे ॥

त्वाम् । चि॒त्र॒श्र॒वः॒ऽत॒म॒ । हव॑न्ते । वि॒क्षु । ज॒न्तवः॑ । शो॒चिःऽके॑शम् । पु॒रु॒ऽप्रि॒य॒ । अग्ने॑ । ह॒व्याय॑ । वोळ्ह॑वे ॥

Mantra without Swara
त्वां चित्रश्रवस्तम हवन्ते विक्षु जन्तवः । शोचिष्केशं पुरुप्रियाग्ने हव्याय वोळ्हवे ॥

त्वाम् । चित्रश्रवःतम । हवन्ते । विक्षु । जन्तवः । शोचिःकेशम् । पुरुप्रिय । अग्ने । हव्याय । वोळ्हवे॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 32 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (चित्रश्रवस्तम) अत्यन्त अद्भुत अन्न वा श्रवणों से व्युत्पन्न (पुरुप्रिय) बहुतों को तृप्त करनेवाले (अग्ने) बिजुली के तुल्य विद्याओं में व्यापक विद्वान् ! जो (जन्तवः) प्राणी लोग (विक्षु) प्रजाओं में (वोढवे) विद्या प्राप्ति कराने हारे (हव्याय) ग्रहण करने योग्य पठन पाठनरूप यज्ञ के लिये जिस (शोचिष्केशम्) जिसके पवित्र आचरण हैं उस (त्वाम्) आपको (हवन्ते) ग्रहण करते हैं, वह आप उनको विद्या और शिक्षा देकर विद्वान् और शील युक्त शीघ्र कीजिये ॥६॥
Essence
मनुष्यों को उचित हैं कि अनेक गुणयुक्त अग्नि के समान विद्वान् को प्राप्त होके विद्याओं का ग्रहण करें ॥६॥
Subject
फिर उसको किस प्रकार ग्रहण करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।