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Rigveda Mandal 1 / Sukta 45 / Mantra 4

191 Sukta
10 Mantra
1/45/4
Devata- अग्निर्देवाः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
महि॑केरव ऊ॒तये॑ प्रि॒यमे॑धा अहूषत । राज॑न्तमध्व॒राणा॑म॒ग्निं शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॑ ॥

महि॑ऽकेरवः । ऊ॒तये॑ । प्रि॒यऽमे॑धाः । अ॒हू॒ष॒त॒ । राज॑न्तम् । अ॒ध्व॒राणा॑म् । अ॒ग्निम् । शु॒क्रेण॑ । शो॒चिषा॑ ॥

Mantra without Swara
महिकेरव ऊतये प्रियमेधा अहूषत । राजन्तमध्वराणामग्निं शुक्रेण शोचिषा ॥

महिकेरवः । ऊतये । प्रियमेधाः । अहूषत । राजन्तम् । अध्वराणाम् । अग्निम् । शुक्रेण । शोचिषा॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 31 Mantra » 4

Bhashya

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Meaning
हे महाविद्वानो ! (महिकेरवः) जिनके बड़े-२ शिल्प विद्या के सिद्ध करनेवाले कारीगर हों ऐसे (प्रियमेधाः) सत्य विद्या वा शिक्षाओं की प्राप्त कराने वाली मेधा बुद्धि युक्त आप लोग (अध्वराणाम्) पालनीय व्यवहाररूपी कर्मों की (ऊतये) रक्षा आदि के लिये (शुक्रेण) शुद्ध शीघ्रकारक (शोचिषा) तेज से (राजन्तम्) प्रकाशमान (अग्निम्) प्रसिद्ध वा बिजुली रूप आग के सदृश सभापति को (अहूषत) उपदेश वा उससे श्रवण किया करो ॥४॥
Essence
कोई मनुष्य धार्मिक बुद्धिमानों के सङ्ग के विना उत्तम-२ व्यवहारों की सिद्धि करने को समर्थ नहीं हो सकता इससे सब मनुष्यों को योग्य है कि इनके सङ्ग से इन विद्याओं को साक्षात्कार अवश्य करें ॥४॥
Subject
फिर विद्वान् लोग उसको किसके लिये प्रेरणा करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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