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Rigveda Mandal 1 / Sukta 45 / Mantra 3

191 Sukta
10 Mantra
1/45/3
Devata- अग्निर्देवाः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्रि॒य॒मे॒ध॒वद॑त्रि॒वज्जात॑वेदो विरूप॒वत् । अ॒ङ्गि॒र॒स्वन्म॑हिव्रत॒ प्रस्क॑ण्वस्य श्रुधी॒ हव॑म् ॥

प्रि॒य॒मे॒ध॒ऽवत् । अ॒त्रि॒ऽवत् । जात॑ऽवेदः । वि॒रू॒प॒ऽवत् । अ॒ङ्गि॒र॒स्वत् । म॒हि॒ऽव्र॒त॒ । प्रस्क॑ण्वस्य । श्रु॒धि॒ । हव॑म् ॥

Mantra without Swara
प्रियमेधवदत्रिवज्जातवेदो विरूपवत् । अङ्गिरस्वन्महिव्रत प्रस्कण्वस्य श्रुधी हवम् ॥

प्रियमेधवत् । अत्रिवत् । जातवेदः । विरूपवत् । अङ्गिरस्वत् । महिव्रत । प्रस्कण्वस्य । श्रुधि । हवम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 31 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (जातवेदः) उत्पन्न हुए पदार्थों को जानने हारे (महिव्रत) बड़े व्रत युक्त विद्वान् ! आप (प्रियमेधवत्) विद्याप्रिय बुद्धि वाले के तुल्य (अत्रिवत्) तीन अर्थात् शरीर अन्य प्राणी और मन आदि इन्द्रियों के दुःखों से रहित के समान (विरूपवत्) अनेक प्रकार के रूपवाले के तुल्य (अङ्गिरस्वत्) अङ्गों के रसरूप प्राणों के सदृश (प्रस्कण्वस्य) उत्तम मेधावी मनुष्य के (हवम्) देने-लेने पढ़ने-पढ़ाने योग्य व्यवहार को (श्रुधि) श्रवण किया करें ॥३॥
Essence
इस मंत्र में उपमालंकार है। हे मनुष्यो ! जैसे सबके प्रिय करनेवाले विद्वान् लोग शरीर, वाणी और मन के दोषों से रहित नानाविद्याओं को प्रत्यक्ष करने और अपने प्राण के समान सबको जानते हुए विद्वान् लोग मनुष्यों के प्रिय कार्य्यों को सिद्ध करते हैं और जैसे पढ़ाये हुए बुद्धिमान् विद्यार्थी भी बहुत उत्तम-२ कार्य्यों को सिद्ध कर सकें वैसे तुम भी किया करो ॥३॥
Subject
फिर वह क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।