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Rigveda Mandal 1 / Sukta 45 / Mantra 2

191 Sukta
10 Mantra
1/45/2
Devata- अग्निर्देवाः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
श्रु॒ष्टी॒वानो॒ हि दा॒शुषे॑ दे॒वा अ॑ग्ने॒ विचे॑तसः । तान्रो॑हिदश्व गिर्वण॒स्त्रय॑स्त्रिंशत॒मा व॑ह ॥

श्रु॒ष्टी॒ऽवानः । हि । दा॒शुषे॑ । दे॒वाः । अ॒ग्ने॒ । विचे॑तसः । तान् । रो॒हि॒त्ऽअ॒श्व॒ । गि॒र्व॒णः॒ । त्रयः॑ऽत्रिंशतम् । आ । व॒ह॒ ॥

Mantra without Swara
श्रुष्टीवानो हि दाशुषे देवा अग्ने विचेतसः । तान्रोहिदश्व गिर्वणस्त्रयस्त्रिंशतमा वह ॥

श्रुष्टीवानः । हि । दाशुषे । देवाः । अग्ने । विचेतसः । तान् । रोहित्अश्व । गिर्वणः । त्रयःत्रिंशतम् । आ । वह॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 31 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (रोहिदश्व) वेग आदि गुणयुक्त (गिर्वणः) वाणियों से सेवित (अग्ने) विद्वन् ! (त्वम्) आप इस संसार में जो (विचेतसः) नाना प्रकार के शास्त्रोक्त ज्ञानयुक्त (श्रुष्टीवानः) यथार्थ विद्या के सेवन करनेवाले (देवाः) दिव्य गुणवान् विद्वान् (दाशुषे) दानशील पुरुषार्थी मनुष्य के लिये सुख देते हैं (तान्) उन (त्रयस्त्रिंशतम्) भूमि आदि तैंतीस दिव्य गुण वालों को (हि) निश्चय करके (आवह) प्राप्त हूजिये ॥२॥
Essence
जब विद्वान् लोग विद्यार्थियों को तैंतीस देव अर्थात् पृथिवी आदि तैंतीस पदार्थों की विद्या को अच्छे प्रकार साक्षात्कार कराते हैं तब वे बिजुली आदि अनेक पदार्थों से उत्तम-२ व्यवहारों की सिद्धि कर सकते हैं ॥२॥
Subject
फिर वह क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।