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Rigveda Mandal 1 / Sukta 45 / Mantra 10

191 Sukta
10 Mantra
1/45/10
Devata- अग्निर्देवाः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒र्वाञ्चं॒ दैव्यं॒ जन॒मग्ने॒ यक्ष्व॒ सहू॑तिभिः । अ॒यं सोमः॑ सुदानव॒स्तं पा॑त ति॒रोअ॑ह्न्यम् ॥

अ॒र्वाञ्च॑म् । दैव्य॑म् । जन॑म् । अग्ने॑ । यक्ष्व॑ । सहू॑तिऽभिः । अ॒यम् । सोमः॑ । सु॒ऽदा॒न॒वः॒ । तम् । पा॒त॒ । ति॒रःऽअ॑ह्न्यम् ॥

Mantra without Swara
अर्वाञ्चं दैव्यं जनमग्ने यक्ष्व सहूतिभिः । अयं सोमः सुदानवस्तं पात तिरोअह्न्यम् ॥

अर्वाञ्चम् । दैव्यम् । जनम् । अग्ने । यक्ष्व । सहूतिभिः । अयम् । सोमः । सुदानवः । तम् । पात । तिरःअह्न्यम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 32 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुदानवः) उत्तम दान शील विद्वान् लोगो ! आप (सहूतिभिः) तुल्यआह्वान युक्त क्रियाओं से (अर्वाञ्चम्) वेगादि गुण वाले घोड़ों को प्राप्त करने वा कराने (दैव्यम्) दिव्य गुणों में प्रवृत्त (तिरोअह्न्यम्) चोर आदि का तिरस्कार करनेहारे दिन में प्रसिद्ध (जनम्) पुरुषार्थ में प्रकट हुए मनुष्य की (पात) रक्षा कीजिये और जैसे (अयम्) यह (सोमः) पदार्थों के समूह सबके सत्कारार्थ है तथा (तम्) उसको तू भी (यक्ष्व) सत्कार में संयुक्त कर ॥१०॥
Essence
मनुष्यों को उचित है कि सर्वदा सज्जनों को बुला सत्कार कर सब पदार्थों को विज्ञान शोधन और उनसे उपकार ले और उत्तरोत्तर इसको जानकर इस विद्या का प्रचार किया करें ॥१०॥ इस सूक्त में वसु, रुद्र और आदित्यों की गति तथा प्रमाण आदि कहा है इससे इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥४५॥ यह ४५ सूक्त और ३२ का वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर भी उसी विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।