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Rigveda Mandal 1 / Sukta 44 / Mantra 8

191 Sukta
14 Mantra
1/44/8
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- विराट्सतःपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स॒वि॒तार॑मु॒षस॑म॒श्विना॒ भग॑म॒ग्निं व्यु॑ष्टिषु॒ क्षपः॑ । कण्वा॑सस्त्वा सु॒तसो॑मास इन्धते हव्य॒वाहं॑ स्वध्वर ॥

स॒वि॒तार॑म् । उ॒षस॑म् । अ॒श्विना॑ । भग॑म् । अ॒ग्निम् । विऽउ॑ष्टिषु । क्षपः॑ । कण्वा॑सः । त्वा॒ । सु॒तऽसो॑मासः । इ॒न्ध॒ते॒ । ह॒व्य॒ऽवाह॑म् । सु॒ऽअ॒ध्व॒र॒ ॥

Mantra without Swara
सवितारमुषसमश्विना भगमग्निं व्युष्टिषु क्षपः । कण्वासस्त्वा सुतसोमास इन्धते हव्यवाहं स्वध्वर ॥

सवितारम् । उषसम् । अश्विना । भगम् । अग्निम् । विउष्टिषु । क्षपः । कण्वासः । त्वा । सुतसोमासः । इन्धते । हव्यवाहम् । सुअध्वर॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 29 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (स्वध्वर) उत्तम यज्ञ वाले विद्वान् ! जो (सुतसोमाः) उत्तम पदार्थों को सिद्ध करते (कण्वासः) मेधावी विद्वान् लोग (व्युष्टिषु) कामनाओं में (सवितारम्) सूर्य्य प्रकाश (उषसम्) प्रातःकाल (अश्विना) वायुजल (क्षपः) रात्रि और (हव्यवाहम्) होम करने योग्य द्रव्यों को प्राप्त करानेवाले (त्वा) आपको (समिन्धते) अच्छे प्रकार प्रकाशित करते हैं, वह आप भी उनको प्रकाशित कीजिये ॥८॥
Essence
मनुष्यों को उचित है कि सब क्रियाओं में दिन-रात प्रयत्न से सूर्य्य आदि पदार्थों को संयुक्त कर वायु वृष्टि की शुद्धि करनेवाले शिल्परूप यज्ञ को प्रकाश करके कार्य्यों को सिद्ध और विद्वानों के संग से इनके गुण जानें ॥८॥
Subject
फिर वह कैसा और किसके सहाय से किसको प्राप्त होता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।