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Rigveda Mandal 1 / Sukta 44 / Mantra 7

191 Sukta
14 Mantra
1/44/7
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- निचृत्पथ्याबृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
होता॑रं वि॒श्ववे॑दसं॒ सं हि त्वा॒ विश॑ इ॒न्धते॑ । स आ व॑ह पुरुहूत॒ प्रचे॑त॒सोऽग्ने॑ दे॒वाँ इ॒ह द्र॒वत् ॥

होता॑रम् । वि॒श्वऽवे॑दसम् । सम् । हि । त्वा॒ । विशः॑ । इ॒न्धते॑ । सः । आ । व॒ह॒ । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । प्रऽचे॑तसः । अग्ने॑ । दे॒वान् । इ॒ह । द्र॒वत् ॥

Mantra without Swara
होतारं विश्ववेदसं सं हि त्वा विश इन्धते । स आ वह पुरुहूत प्रचेतसोऽग्ने देवाँ इह द्रवत् ॥

होतारम् । विश्ववेदसम् । सम् । हि । त्वा । विशः । इन्धते । सः । आ । वह । पुरुहूत । प्रचेतसः । अग्ने । देवान् । इह । द्रवत्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 29 Mantra » 2

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Meaning
हे (पुरुहूत) बहुत विद्वानों ने बुलाये हुए (अग्ने) विशिष्ट ज्ञानयुक्त विद्वन् ! (प्रचेतसः) उत्तम ज्ञानयुक्त (विशः) प्रजा जिस (होतारम्) हवन के कर्त्ता (विश्ववेदसम्) सब सुख प्राप्त (त्वा) आपको (हि) निश्चय करके (समिन्धते) अच्छे प्रकार प्रकाश करती हैं (सः) सो आप (इह) इस युद्ध आदि कर्मों में उत्तम ज्ञान वाले (देवान्) शूरवीर विद्वानों को (आवह) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये ॥७॥
Essence
विद्वानों के सहाय के विना प्रजा के सुख को वा दिव्य गुणों की प्राप्ति और शत्रुओं से विजय नहीं हो सकता इससे यह सब मनुष्यों को प्रयत्न के साथ सिद्ध करना चाहिये ॥७॥
Subject
फिर वह किस प्रकार का है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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