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Rigveda Mandal 1 / Sukta 44 / Mantra 6

191 Sukta
14 Mantra
1/44/6
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- भुरिग्बृहती Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सु॒शंसो॑ बोधि गृण॒ते य॑विष्ठ्य॒ मधु॑जिह्वः॒ स्वा॑हुतः । प्रस्क॑ण्वस्य प्रति॒रन्नायु॑र्जी॒वसे॑ नम॒स्या दैव्यं॒ जन॑म् ॥

सु॒शंसः॑ । बो॒धि॒ । गृ॒ण॒ते । य॒वि॒ष्ठ्य॒ । मधु॑ऽजिह्वः । सुऽआ॑हुतः । प्रस्क॑ण्वस्य । प्र॒ऽति॒रन् । आयुः॑ । जी॒वसे॑ । न॒म॒स्य । दैव्य॑म् । जन॑म् ॥

Mantra without Swara
सुशंसो बोधि गृणते यविष्ठ्य मधुजिह्वः स्वाहुतः । प्रस्कण्वस्य प्रतिरन्नायुर्जीवसे नमस्या दैव्यं जनम् ॥

सुशंसः । बोधि । गृणते । यविष्ठ्य । मधुजिह्वः । सुआहुतः । प्रस्कण्वस्य । प्रतिरन् । आयुः । जीवसे । नमस्य । दैव्यम् । जनम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 29 Mantra » 1

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Meaning
हे (यविष्ठ्य) अत्यन्त बलवान् (नमस्य) पूजने योग्य विद्वान् (मधुजिह्वः) मधुर ज्ञानरूप जिह्वा युक्त (सुशंसः) उत्तम स्तुति से प्रशंसित (स्वाहुतः) सुख से आह्वान बोलने योग्य (प्रस्कण्वस्य) उत्तम मेधावी विद्वान् के (जीवसे) जीवन के लिये (आयुः) जीवन को (प्रतिरन्) दुःखों से पार करते जो आप (गृणते) सत्य की स्तुति करते हुए मनुष्य के लिये शास्त्रों का (बोधि) बोध कीजिये और जिससे (दैव्यम्) विद्वानों में उत्पन्न हुए (जनम्) मनुष्य की रक्षा करते हो इससे सत्कार के योग्य हो ॥६॥
Essence
सब मनुष्यों को उचित है कि जो सबसे उत्कृष्ट विद्वान् है उसीका सत्कार करें ऐसे ही इसका अच्छे प्रकार आश्रय लेकर सब उमर और विद्या को प्राप्त करें ॥६॥
Subject
फिर वह कैसा है, किसके लिये क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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