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Rigveda Mandal 1 / Sukta 44 / Mantra 5

191 Sukta
14 Mantra
1/44/5
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- उपरिष्टाद्विराड् बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
स्त॒वि॒ष्यामि॒ त्वाम॒हं विश्व॑स्यामृत भोजन । अग्ने॑ त्रा॒तार॑म॒मृतं॑ मियेध्य॒ यजि॑ष्ठं हव्यवाहन ॥

स्त॒वि॒ष्यामि॑ । त्वाम् । अ॒हम् । विश्व॑स्य । अ॒मृ॒त॒ । भो॒ज॒न॒ । अग्ने॑ । त्रा॒तार॑म् । अ॒मृत॑म् । मि॒ये॒ध्य॒ । यजि॑ष्ठम् । ह॒व्य॒ऽवा॒ह॒न॒ ॥

Mantra without Swara
स्तविष्यामि त्वामहं विश्वस्यामृत भोजन । अग्ने त्रातारममृतं मियेध्य यजिष्ठं हव्यवाहन ॥

स्तविष्यामि । त्वाम् । अहम् । विश्वस्य । अमृत । भोजन । अग्ने । त्रातारम् । अमृतम् । मियेध्य । यजिष्ठम् । हव्यवाहन॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 28 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
(अमृत) अविनाशिस्वरूप (भोजन) पालनकर्त्ता (मियेध्य) प्रमाण करने (हव्यवाहन) लेने देने योग्य पदार्थों को प्राप्त करानेवाले (अग्ने) परमेश्वर (अहम्) मैं (विश्वस्य) सब जगत् के (त्रातारम्) रक्षा (यजिष्ठम्) अत्यन्त यजन करनेवाले (अमृतम्) नित्य स्वरूप (त्वा) तुझ ही की (स्तविष्यामि) स्तुति करूंगा ॥५॥
Essence
विद्वानों को योग्य है कि इस सब जगत् के रक्षक मोक्ष देने, विद्या काम आनन्द के देने वा वा उपासना करने योग्य परमेश्वर को छोड़ अन्य किसी का भी ईश्वरभाव से आश्रय न करें ॥५॥
Subject
फिर कैसे को ग्रहण करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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