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Rigveda Mandal 1 / Sukta 44 / Mantra 4

191 Sukta
14 Mantra
1/44/4
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- विराट्सतःपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
श्रेष्ठं॒ यवि॑ष्ठ॒मति॑थिं॒ स्वा॑हुतं॒ जुष्टं॒ जना॑य दा॒शुषे॑ । दे॒वाँ अच्छा॒ यात॑वे जा॒तवे॑दसम॒ग्निमी॑ळे॒ व्यु॑ष्टिषु ॥

श्रेष्ठ॑म् । यवि॑ष्ठम् । अति॑थिम् । सुऽआ॑हुतम् । जुष्टम् । जना॑य । दा॒शुषे॑ । दे॒वान् । अच्छ॑ । यात॑वे । जा॒तऽवे॑दसम् । अ॒ग्निम् । ई॒ळे॒ । विऽउ॑ष्टिषु ॥

Mantra without Swara
श्रेष्ठं यविष्ठमतिथिं स्वाहुतं जुष्टं जनाय दाशुषे । देवाँ अच्छा यातवे जातवेदसमग्निमीळे व्युष्टिषु ॥

श्रेष्ठम् । यविष्ठम् । अतिथिम् । सुआहुतम् । जुष्टम् । जनाय । दाशुषे । देवान् । अच्छ । यातवे । जातवेदसम् । अग्निम् । ईळे । विउष्टिषु॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 28 Mantra » 4

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Meaning
मैं (व्युष्टिषु) विशिष्ट पढ़ने के योग्य कामनाओं में (यातवे) प्राप्ति के लिये (दाशुषे) दाता (जनाय) धार्मिक विद्वान् मनुष्य के अर्थ (श्रेष्ठम्) अति उत्तम (यविष्ठम्) परम बलवान् (जुष्टम्) विद्वान् से प्रसन्न वा सेवित (स्वाहुतम्) अच्छे प्रकार बुलाके सत्कार के योग्य (जातवेदसम्) सब पदार्थों में व्याप्त (अतिथिम्) सेवा करने के योग्य (अग्निम्) अग्नि के तुल्य वर्त्तमान सज्जन अतिथि और (देवान्) दिव्य गुण वाले विद्वानों को (अच्छे) अच्छे प्रकार सत्कार करूं ॥४॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। मनुष्यों को अति योग्य है कि उत्तम धर्म बल वाले प्रसन्न स्वभाव सहित सब के उपकारक विद्वान् और अतिथियों का सत्कार करें जिससे सब जनों का हित हो ॥४॥
Subject
फिर किस प्रकार के विद्वान् को ग्रहण करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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