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Rigveda Mandal 1 / Sukta 44 / Mantra 3

191 Sukta
14 Mantra
1/44/3
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- निचृदुपरिष्टाद् बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ॒द्या दू॒तं वृ॑णीमहे॒ वसु॑म॒ग्निं पु॑रुप्रि॒यम् । धू॒मके॑तुं॒ भाऋ॑जीकं॒ व्यु॑ष्टिषु य॒ज्ञाना॑मध्वर॒श्रिय॑म् ॥

अ॒द्य । दू॒तम् । वृ॒णी॒म॒हे॒ । वसु॑म् । अ॒ग्निम् । पु॒रु॒ऽप्रि॒यम् । धू॒मऽके॑तुम् । भाःऽऋ॑जीकम् । विऽउ॑ष्टिषु । य॒ज्ञाना॑म् । अ॒ध्व॒र॒ऽश्रिय॑म् ॥

Mantra without Swara
अद्या दूतं वृणीमहे वसुमग्निं पुरुप्रियम् । धूमकेतुं भाऋजीकं व्युष्टिषु यज्ञानामध्वरश्रियम् ॥

अद्य । दूतम् । वृणीमहे । वसुम् । अग्निम् । पुरुप्रियम् । धूमकेतुम् । भाःऋजीकम् । विउष्टिषु । यज्ञानाम् । अध्वरश्रियम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 28 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हम लोग (अद्य) आज मनुष्य जन्म वा विद्या के प्राप्ति समय को प्राप्त होकर (व्युष्टिषु) अनेक प्रकार की कामनाओं में (भाऋजीकम्) कामनाओं के प्रकाश (यज्ञानाम्) अग्निहोत्र आदि अश्वमेघ पर्यन्त वा योग उपासना ज्ञान शिल्पविद्यारूप यज्ञों के मध्य (अध्वरश्रियम्) अहिंसनीय यज्ञों की श्री शोभारूप (धूमकेतुम्) जिसका धूम ही ध्वजा है (वसुम्) सब विद्याओं का घर वा बहुत धन की प्राप्ति का हेतु (पुरुप्रियम्) बहुतों को प्रिय (दूतम्) पदार्थों को दूर पहुंचानेवाले (अग्निम्) भौतिक अग्नि के सदृश विद्वान् दूत को (वृणीमहे) अंगीकार करें ॥३॥
Essence
मनुष्यों को उचित है कि विद्या वा राज्य की प्राप्ति के लिये सब विद्याओं के कथन करने वा सब बातों का उत्तर देनेवाले विद्वान् को दूत करें और बहुत गुणों के योग से बहुत कार्य्यों को प्राप्त करानेवाली बिजुली को स्वीकार करके सब कार्य्यों को सिद्ध करें ॥३॥
Subject
फिर कैसे मनुष्य को स्वीकार करे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।