Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 44 / Mantra 2

191 Sukta
14 Mantra
1/44/2
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- विराट्सतःपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
जुष्टो॒ हि दू॒तो असि॑ हव्य॒वाह॒नोऽग्ने॑ र॒थीर॑ध्व॒राणा॑म् । स॒जूर॒श्विभ्या॑मु॒षसा॑ सु॒वीर्य॑म॒स्मे धे॑हि॒ श्रवो॑ बृ॒हत् ॥

जुष्टः॑ । हि । दू॒तः । असि॑ । ह॒व्य॒ऽवाहनः । अग्ने॑ । र॒थीः । अ॒ध्व॒राणा॑म् । स॒ऽजूः । अ॒श्विऽभ्या॑म् । उ॒षसा॑ । सु॒ऽवीर्य॑म् । अ॒स्मे इति॑ । धे॒हि॒ । श्रवः॑ । बृ॒हत् ॥

Mantra without Swara
जुष्टो हि दूतो असि हव्यवाहनोऽग्ने रथीरध्वराणाम् । सजूरश्विभ्यामुषसा सुवीर्यमस्मे धेहि श्रवो बृहत् ॥

जुष्टः । हि । दूतः । असि । हव्यवाहनः । अग्ने । रथीः । अध्वराणाम् । सजूः । अश्विभ्याम् । उषसा । सुवीर्यम् । अस्मे इति । धेहि । श्रवः । बृहत्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 28 Mantra » 2

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) पावक के समान राजविद्या के जाननेवाले विद्वान् ! (हि) जिस कारण आप (जुष्टः) प्रसन्न प्रकृति और (दूतः) शत्रुओं को ताप करानेवाले होकर (अध्वराणाम्) अहिंसनीय यज्ञों को सिद्ध करते (रथीः) प्रशंसनीय रथयुक्त (हव्यवाहनः) देने लेने योग्य वस्तुओं को प्राप्त होने (सजूः) अपने तुल्यों के सेवन करनेवाले (असि) हो इससे (अस्मे) हम लोगों में (अश्विभ्याम्) वायु जल (उषसा) प्रातःकाल में सिद्ध हुई क्रिया से सिद्ध किये हुए (बृहत्) बड़े (सुवीर्य्यम्) उत्तम पराक्रम कारक (श्रवः) सब विद्या के श्रवण का निमित्त अन्न को (धेहि) धारण कीजिये ॥२॥
Essence
कोई मनुष्य विद्वानों के सङ्ग के विना विद्या को प्राप्त, शत्रु को जीतके उत्तम पराक्रम चक्रवर्त्ति राज्य लक्ष्मी के प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता और अग्नि जल आदि के योग के विना उत्तम व्यवहार की सिद्धि भी नहीं कर सकता ॥२॥
Subject
फिर विद्वानों के सङ्ग के गुणों का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.