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Rigveda Mandal 1 / Sukta 44 / Mantra 13

191 Sukta
14 Mantra
1/44/13
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- पथ्यावृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
श्रु॒धि श्रु॑त्कर्ण॒ वह्नि॑भिर्दे॒वैर॑ग्ने स॒याव॑भिः । आ सी॑दन्तु ब॒र्हिषि॑ मि॒त्रो अ॑र्य॒मा प्रा॑त॒र्यावा॑णो अध्व॒रम् ॥

श्रु॒धि । श्रु॒त्ऽक॒र्ण॒ । वह्नि॑ऽभिः । दे॒वैः । अ॒ग्ने॒ । स॒याव॑ऽभिः । आ । सी॒द॒न्तु॒ । ब॒र्हिषि॑ । मि॒त्रः । अ॒र्य॒मा । प्रा॒तः॒ऽयावा॑नः । अ॒ध्व॒रम् ॥

Mantra without Swara
श्रुधि श्रुत्कर्ण वह्निभिर्देवैरग्ने सयावभिः । आ सीदन्तु बर्हिषि मित्रो अर्यमा प्रातर्यावाणो अध्वरम् ॥

श्रुधि । श्रुत्कर्ण । वह्निभिः । देवैः । अग्ने । सयावभिः । आ । सीदन्तु । बर्हिषि । मित्रः । अर्यमा । प्रातःयावानः । अध्वरम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 30 Mantra » 3

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Meaning
हे (श्रुत्कर्ण) श्रवण करनेवाले (अग्ने) विद्याप्रकाशक विद्वन् ! आप प्रीति के साथ (सयावभिः) तुल्य जाननेवाले (वन्हिभिः) सत्याचार के भार धरनेहारे मनुष्य आदि (देवैः) विद्वान् और दिव्यगुणों के साथ (अस्माकम्) हम लोगों की वर्त्ताओं को (श्रुधि) सुनो, तुम और हम लोग (मित्रः) सबके हितकारी (अर्य्यमा) न्यायाधीश (प्रातर्य्यावाणः) प्रतिदिन पुरुषार्थ से युक्त (सर्वे) सब (अध्वरम्) अहिंसनीय पहिले कहे हुए यज्ञ को प्राप्त होकर (बर्हिषि) उत्तम व्यवहार में (आसीदन्तु) ज्ञान को प्राप्त हों वा स्थित हों ॥१३॥
Essence
मनुष्यों को उचित है कि सब विद्याओं को श्रवण किये हुए धार्मिक मनुष्यों को राज्यव्यवहार में विशेष करके युक्त विद्वान् लोग शिक्षा से युक्त भृत्यों से सब कार्य्यों को सिद्ध और सर्वदा आलस्य को छोड़ निरन्तर पुरुषार्थ में यत्न करें। निदान इसके विना निश्चय है कि, व्यवहार वा परमार्थ कभी सिद्ध नहीं होते ॥१३॥ सं० भा० के अनुसार करें, और। सं०
Subject
फिर वह विद्वान् कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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