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Rigveda Mandal 1 / Sukta 44 / Mantra 12

191 Sukta
14 Mantra
1/44/12
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- भुरिग्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
यद्दे॒वानां॑ मित्रमहः पु॒रोहि॒तोऽन्त॑रो॒ यासि॑ दू॒त्य॑म् । सिन्धो॑रिव॒ प्रस्व॑नितास ऊ॒र्मयो॒ऽग्नेर्भ्रा॑जन्ते अ॒र्चयः॑ ॥

यत् । दे॒वाना॑म् । मि॒त्र॒ऽम॒हः॒ । पु॒रःऽहितः । अन्त॑रः । यासि॑ । दू॒त्य॑म् । सिन्धोः॑ऽइव । प्रऽस्व॑नितासः । ऊ॒र्मयः॑ । अ॒ग्नेः । भ्रा॒ज॒न्ते॒ । अ॒र्चयः॑ ॥

Mantra without Swara
यद्देवानां मित्रमहः पुरोहितोऽन्तरो यासि दूत्यम् । सिन्धोरिव प्रस्वनितास ऊर्मयोऽग्नेर्भ्राजन्ते अर्चयः ॥

यत् । देवानाम् । मित्रमहः । पुरःहितः । अन्तरः । यासि । दूत्यम् । सिन्धोःइव । प्रस्वनितासः । ऊर्मयः । अग्नेः । भ्राजन्ते । अर्चयः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 30 Mantra » 2

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Meaning
हे (मित्रमहः) मित्रों में बड़े पूजनीय विद्वान् ! आप मध्यस्थ होकर (दूत्यम्) दूत कर्म को (यासि) प्राप्त करते हो जिस (अग्नेः) आत्मा की (सिन्धोरिव) समुद्र के सदृश (प्रस्वनितासः) शब्द करती हुई (ऊर्मयः) लहरियाँ (अग्नेः) अग्नि के (अर्चयः) दीप्तियां (भ्राजन्ते) प्रकाशित होती हैं। (पुरोहितः) पुरोहित तथा (अन्तरः) मध्यस्थ होते हुए (देवानाम्) विद्वानों के (दूत्यम्) दूत के स्वभाव को (यासि) प्राप्त होते हो सो आप हम लोगों को सत्कार के योग्य क्यों न हों ॥१२॥
Essence
इस मंत्र में उपमालंकार है। हे मनुष्यो ! तुम जैसे परमेश्वर सबका मित्र पूजनीय पुरोहित अन्तर्यामी होकर दूत के समान सत्य असत्य कर्मों का प्रकाश करता है जैसे ईश्वर की अनन्त दीप्ति विचरती हैं जो ईश्वर सबका धाता, रचने वा पालन करने वा न्यायकारी महाराज सबको उपासने योग्य है, वैसे उत्तम दूत भी राजपुरुषों को माननीय होता है ॥१२॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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