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Rigveda Mandal 1 / Sukta 44 / Mantra 11

191 Sukta
14 Mantra
1/44/11
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- निचृत्पथ्याबृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
नि त्वा॑ य॒ज्ञस्य॒ साध॑न॒मग्ने॒ होता॑रमृ॒त्विज॑म् । म॒नु॒ष्वद्दे॑व धीमहि॒ प्रचे॑तसं जी॒रं दू॒तमम॑र्त्यम् ॥

नि । त्वा॒ । य॒ज्ञस्य॑ । साध॑नम् । अग्ने॑ । होता॑रम् । ऋ॒त्विज॑म् । म॒नु॒ष्वत् । दे॒व॒ । धी॒म॒हि॒ । प्रऽचे॑तसम् । जी॒रम् । दू॒तम् । अम॑र्त्यम् ॥

Mantra without Swara
नि त्वा यज्ञस्य साधनमग्ने होतारमृत्विजम् । मनुष्वद्देव धीमहि प्रचेतसं जीरं दूतममर्त्यम् ॥

नि । त्वा । यज्ञस्य । साधनम् । अग्ने । होतारम् । ऋत्विजम् । मनुष्वत् । देव । धीमहि । प्रचेतसम् । जीरम् । दूतम् । अमर्त्यम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 30 Mantra » 1

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Meaning
हे (देव) दिव्यविद्यासम्पन्न (अग्ने) भौतिक अग्नि के सदृश उत्तम पदार्थों को सम्पादन करनेवाले मेधावी विद्वान् ! हम लोग (यज्ञस्य) तीन प्रकार के यज्ञ के (साधनम्) मुख्य साधक (होतारम्) हवन करने वा ग्रहण करनेवाले (ऋत्विजम्) यज्ञ साधक (प्रचेतसम्) उत्तम विज्ञान युक्त (जीरम्) वेगवान् (अमर्त्यम्) साधारण मनुष्यस्वभाव से रहित वा स्वरूप से नित्य (दूतम्) प्रशंसनीय बुद्धियुक्त वा पदार्थों को देशान्तर में प्राप्त करनेवाले (त्वा) आपको (मनुष्वत्) मननशील मनुष्य के समान (निधीमहि) निरन्तर धारण करें ॥११॥
Essence
इस मंत्र में उपमालंकार है। और आठवें मंत्र से (सुतसोमाः) (कण्वासः) इन दो पदों की अनुवृत्ति है। विद्वान् अग्नि आदि साधन और द्रव्य आदि सामग्री के विना यज्ञ की सिद्धि नहीं कर सकता ॥११॥
Subject
फिर वह किस प्रकार का हो, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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