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Rigveda Mandal 1 / Sukta 44 / Mantra 10

191 Sukta
14 Mantra
1/44/10
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhanda- विराड्विस्तारपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अग्ने॒ पूर्वा॒ अनू॒षसो॑ विभावसो दी॒देथ॑ वि॒श्वद॑र्शतः । असि॒ ग्रामे॑ष्ववि॒ता पु॒रोहि॒तोऽसि॑ य॒ज्ञेषु॒ मानु॑षः ॥

अग्ने॑ । पूर्वाः॑ । अनु॑ । उ॒षसः॑ । वि॒भा॒व॒सो॒ इति॑ विभाऽवसो । दी॒देथ॑ । वि॒श्वऽद॑र्शतः । असि॑ । ग्रामे॑षु । अ॒वि॒ता । पु॒रःऽहि॑तः । असि॑ । य॒ज्ञेषु॑ । मानु॑षः ॥

Mantra without Swara
अग्ने पूर्वा अनूषसो विभावसो दीदेथ विश्वदर्शतः । असि ग्रामेष्वविता पुरोहितोऽसि यज्ञेषु मानुषः ॥

अग्ने । पूर्वाः । अनु । उषसः । विभावसो इति विभावसो । दीदेथ । विश्वदर्शतः । असि । ग्रामेषु । अविता । पुरःहितः । असि । यज्ञेषु । मानुषः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 29 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (विभावसो) विशेष दीप्ति को बसानेवाले (अग्ने) विद्या को प्राप्त करनेहारे विद्वान् ! (विश्वदर्शतः) सभों को देखने योग्य आप (पूर्वाः) पहिले व्यतीत (अनु) फिर (उषसः) आने वाली और वर्त्तमान प्रभात और रात दिनों को (दीदेथ) जानकर एक क्षण भी व्यर्थ न खोवे आप ही (ग्रामेषु) मनुष्यों के निवास योग्य ग्रामों में (अविता) रक्षा करनेवाले (असि) हो और (यज्ञेषु) अश्वमेघ आदि शिल्प पर्य्यन्त क्रियाओं में (मानुषः) मनुष्य व्यक्ति (पुरोहितः) सब साधनों के द्वारा सब सुखों को सिद्ध करनेवाले (असि) हो ॥१०॥
Essence
विद्वान् सब दिन एक क्षण भी व्यर्थ न खोवे सर्वथा बहुत उत्तम-२ कार्य्यों के अनुष्ठान ही के लिये सब दिनों को जानकर प्रजा की रक्षा वा यज्ञ का अनुष्ठान करनेवाला निरन्तर हो ॥१०॥
Subject
फिर वह कैसा हो क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।