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Rigveda Mandal 1 / Sukta 42 / Mantra 9

191 Sukta
10 Mantra
1/42/9
Devata- पूषा Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
श॒ग्धि पू॒र्धि प्र यं॑सि च शिशी॒हि प्रास्यु॒दर॑म् । पूष॑न्नि॒ह क्रतुं॑ विदः ॥

श॒ग्धि । पू॒र्धि । प्र । यं॒सि॒ । च॒ । शि॒शी॒हि । प्रासि॑ । उ॒दर॑म् । पूष॑न् । इ॒ह । क्रतु॑म् । वि॒दः॒ ॥

Mantra without Swara
शग्धि पूर्धि प्र यंसि च शिशीहि प्रास्युदरम् । पूषन्निह क्रतुं विदः ॥

शग्धि । पूर्धि । प्र । यंसि । च । शिशीहि । प्रासि । उदरम् । पूषन् । इह । क्रतुम् । विदः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 25 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पूषन्) सभासेनाधिपते ! आप हम लोगों के (शग्धि) सुख देने के लिये समर्थ (पूर्धि) सब सुखों की पूर्त्ति कर (प्रयंसि) दुष्ट कर्मों से पृथक् रह (शिशीहि) सुख पूर्वक सो वा दुष्टों का छेदन कर (प्रासि) सब सेना वा प्रजा के अङ्गों को पूरण कीजिये और हम लोगों के (उदरम्) उदर को उत्तम अन्नों से (इह) इस प्रजा के सुख से तथा (क्रतुम) युद्ध विद्या को (विदः) प्राप्त हूजिये ॥९॥
Essence
इस मंत्र में श्लेषाऽलंकार है। सभा सेनाध्यक्ष के विना इस संसार में कोई सामर्थ्य को देने वा सुखों से अलंकृत करने पुरुषार्थ को देने चोर डाकुओं से भय निवारण करने सबको उत्तम भोग देने और न्यायविद्या का प्रकाश करनेवाला अन्य नहीं हो सकता इससे दोनों का आश्रय सब मनुष्य करें ॥९॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।