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Rigveda Mandal 1 / Sukta 42 / Mantra 4

191 Sukta
10 Mantra
1/42/4
Devata- पूषा Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वं तस्य॑ द्वया॒विनो॒ऽघशं॑सस्य॒ कस्य॑ चित् । प॒दाभि ति॑ष्ठ॒ तपु॑षिम् ॥

त्वम् । तस्य॑ । द्व॒या॒विनः॑ । अ॒घऽशं॑सस्य । कस्य॑ । चि॒त् । प॒दा । अ॒भि । ति॒ष्ठ॒ । तपु॑षिम् ॥

Mantra without Swara
त्वं तस्य द्वयाविनोऽघशंसस्य कस्य चित् । पदाभि तिष्ठ तपुषिम् ॥

त्वम् । तस्य । द्वयाविनः । अघशंसस्य । कस्य । चित् । पदा । अभि । तिष्ठ । तपुषिम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 24 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे सेनासभाध्यक्ष ! (त्वम्) आप (तस्य) उस (द्वयाविनः) प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष औरों के पदार्थों को हरने वाले (कस्यचित्) किसी (अघशंसस्य) (तपुषिम्) चोरों की सेना को (पदाभितिष्ठ) बल से वशीभूत कीजिये ॥४॥
Essence
न्याय करनेवाले मनुष्यों को उचित है कि किसी अपराधी चोर को दण्ड देने विना छोड़ना कभी न चाहिये, नहीं तो, प्रजा पीड़ायुक्त होकर नष्ट भ्रष्ट होने से राज्य का नाश होजाय इस कारण प्रजा की रक्षा के लिये दुष्ट कर्म करनेवाले अपराध किये हुए माता-पिता, आचार्य्य और मित्र आदि को भी अपराध के योग्य ताड़ना अवश्य देनी चाहिये ॥४॥
Subject
फिर इन पूर्वोक्त चोरों की क्या गति करनी चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।