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Rigveda Mandal 1 / Sukta 42 / Mantra 3

191 Sukta
10 Mantra
1/42/3
Devata- पूषा Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अप॒ त्यं प॑रिप॒न्थिनं॑ मुषी॒वाणं॑ हुर॒श्चित॑म् । दू॒रमधि॑ स्रु॒तेर॑ज ॥

अप॑ । त्यम् । प॒रि॒ऽप॒न्थिन॑म् । मु॒षी॒वाण॑म् । हु॒रः॒ऽचित॑म् । दू॒रम् । अधि॑ । स्रु॒तेः । अ॒ज॒ ॥

Mantra without Swara
अप त्यं परिपन्थिनं मुषीवाणं हुरश्चितम् । दूरमधि स्रुतेरज ॥

अप । त्यम् । परिपन्थिनम् । मुषीवाणम् । हुरःचितम् । दूरम् । अधि । स्रुतेः । अज॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 24 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् राजन् ! आप (त्यम्) उस (परिपंथिनम्) प्रतिकूल चलनेवाले डांकू (मुषीवाणम्) चोर कर्म से भित्ति को फोड़ कर दृष्टि का आच्छादन कर दूसरे के पदार्थों को हरने (हुरश्चितम्) उत्कोचक अर्थात् हाथ से दूसरे के पदार्थ को ग्रहण करनेवाले अनेक प्रकार से चोरों को (स्रुतेः) राजधर्म और प्रजामार्ग से (दूरम्) (अध्यपाज) उनपर दण्ड और शिक्षा कर दूर कीजिये ॥३॥
Essence
चोर अनेक प्रकार के होते हैं, कोई डांकू कोई कपट से हरने, कोई मोहित करके दूसरे के पदार्थों को ग्रहण करने, कोई रात में सुरंग लगाकर ग्रहण, करने कोई उत्कोचक अर्थात् हाथ से छीन लेने, कोई नाना प्रकार के व्यवहारी दुकानों में बैठ छल से पदार्थों को हरने, कोई शुल्क अर्थात् रिशवत लेने, कोई भृत्य होकर स्वामी के पदार्थों को हरने, कोई छल कपट से ओरों के राज्य को स्वीकार करने, कोई धर्मोपदेश से मनुष्यों को भ्रमाकर गुरु बन शिष्यों के पदार्थों को हरने, कोई प्राड्विवाक अर्थात् वकील होकर मनुष्यों को विवाद में फंसाकर पदार्थों को हरलेने और कोई न्यायासन पर बैठ प्रजा से धन लेके अन्याय करनेवाले इत्यादि हैं, इन सबको चोर जानो, इनको सब उपायों से निकाल कर मनुष्यों को धर्म से राज्य का पालन करना चाहिये ॥३॥
Subject
फिर इस मार्ग से किन-२ का निवारण करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।