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Rigveda Mandal 1 / Sukta 42 / Mantra 2

191 Sukta
10 Mantra
1/42/2
Devata- पूषा Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यो नः॑ पूषन्न॒घो वृको॑ दुः॒शेव॑ आ॒दिदे॑शति । अप॑ स्म॒ तं प॒थो ज॑हि ॥

यः । नः॒ । पू॒ष॒न् । अ॒घः । वृकः॑ । दुः॒शेव॑ । आ॒ऽदिदे॑शति । अप॑ । स्म॒ । तम् । प॒थः । ज॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
यो नः पूषन्नघो वृको दुःशेव आदिदेशति । अप स्म तं पथो जहि ॥

यः । नः । पूषन् । अघः । वृकः । दुःशेव । आदिदेशति । अप । स्म । तम् । पथः । जहि॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 24 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पूषन्) सब जगत् को विद्या से पुष्ट करनेवाले विद्वान् ! आप (यः) जो (अघः) पाप करने (दुःशेवः) दुःख में शयन कराने योग्य (वृकः) स्तेन अर्थात् दुःख देने वाला चोर (नः) हम लोगों को (आदिदेशति) उद्देश करके पीड़ा देता हो (तम्) उस दुष्ट स्वभाव वाले को (पथः) राजधर्म और प्रजामार्ग से (अपजहि) नष्ट वा दूर कीजिये ॥२॥
Essence
मनुष्यों को उचित है कि शिक्षा विद्या तथा सेना के बल से दूसरे के धन को लेने वाले शठ और चोरों को मारना सर्वथा दूर करना निरन्तर बाँध के राजनीति के मार्गों को भय से रहित संपादन करें जैसे जगदीश्वर दुष्टों को उनके कर्मों के अनुसार दण्ड के द्वारा शिक्षा करता है वैसे हम लोग भी दुष्टों को दण्ड द्वारा शिक्षा देकर श्रेष्ठ स्वभावयुक्त करें ॥२॥
Subject
जो धर्म्म और राज्य के मार्गों में विघ्न करते हैं, उनका निवारण करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया हैं।