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Rigveda Mandal 1 / Sukta 42 / Mantra 10

191 Sukta
10 Mantra
1/42/10
Devata- पूषा Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न पू॒षणं॑ मेथामसि सू॒क्तैर॒भि गृ॑णीमसि । वसू॑नि द॒स्ममी॑महे ॥

न । पू॒षण॑म् । मे॒था॒म॒सि॒ । सू॒क्तैः । अ॒भि । गृ॒णी॒म॒सि॒ । वसू॑नि । द॒स्मम् । ई॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
न पूषणं मेथामसि सूक्तैरभि गृणीमसि । वसूनि दस्ममीमहे ॥

न । पूषणम् । मेथामसि । सूक्तैः । अभि । गृणीमसि । वसूनि । दस्मम् । ईमहे॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 25 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
हे मनुष्य लोगो ! जैसे हम लोग (सूक्तैः) वेदोक्त स्तोत्रों से (पूषणम्) सभा और सेनाध्यक्ष को (अभिगृणीमसि) गुण ज्ञानपूर्वक स्तुति करते हैं (दस्मम्) शत्रु को (मेथामसि) मारते हैं। (वसूनि) उत्तम वस्तुओं को (ईमहे) याचना करते हैं और आपस में द्वेष कभी (न) नहीं करते वैसे तुम भी किया करो ॥१०॥
Essence
इस मंत्र में श्लेषालंकार है। किसी मनुष्य को नास्तिक वा मूर्खपन से सभाध्यक्ष की आज्ञा को छोड़ शत्रु की याचना न करनी चाहिये किन्तु वेदों से राजनीति को जानके इन दोनों के सहाय से शत्रुओं को मार विज्ञान वा सुवर्ण आदि धनों को प्राप्त होकर उत्तम मार्ग में सुपात्रों के लिये दान देकर विद्या का विस्तार करना चाहिये ॥१०॥ इस सूक्त में पूषन् शब्द का वर्णन शक्ति का बढ़ाना, दुष्ट शत्रुओं का निवारण संपूर्ण ऐश्वर्य्य की प्राप्ति सुमार्ग में चलना, बुद्धि वा कर्म का बढ़ाना कहा है। इससे इस सूक्त के अर्थ के संगति पूर्व सूक्तार्थ के साथ जाननी चाहिये। यह पच्चीसवां वर्ग २५ और बयालीसवां सूक्त समाप्त हुआ ॥४२॥
Subject
उसका आश्रय लेकर कैसे होना वा क्या करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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