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Rigveda Mandal 1 / Sukta 41 / Mantra 4

191 Sukta
9 Mantra
1/41/4
Devata- आदित्याः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सु॒गः पन्था॑ अनृक्ष॒र आदि॑त्यास ऋ॒तं य॒ते । नात्रा॑वखा॒दो अ॑स्ति वः ॥

सु॒ऽगः । पन्था॑ । अ॒नृ॒क्ष॒रः । आदि॑त्यासः । ऋ॒तम् । य॒ते । न । अत्र॑ । अ॒व॒ऽखा॒दः । अ॒स्ति॒ । वः॒ ॥

Mantra without Swara
सुगः पन्था अनृक्षर आदित्यास ऋतं यते । नात्रावखादो अस्ति वः ॥

सुगः । पन्था । अनृक्षरः । आदित्यासः । ऋतम् । यते । न । अत्र । अवखादः । अस्ति । वः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 22 Mantra » 4

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Meaning
जहां (आदित्यासः) अच्छे प्रकार सेवन से अड़तालीस वर्ष युक्त ब्रह्मचर्य से शरीर आत्मा के बल सहित होने से सूर्य्य के समान प्रकाशित हुए अविनाशी धर्म्म को जाननेवाले विद्वान् लोग रक्षा करनेवाले हों वा जहां इन्हों से जिस (अनृक्षरः) कण्टक गड्ढा चोर डाकू अविद्या अधर्माचरण से रहित सरल (सुगः) सुख से जानने योग्य (पन्थाः) जल स्थल अन्तरिक्ष में जाने के लिये वा विद्या धर्म न्याय प्राप्ति के मार्ग का सम्पादन किया हो उस और (ऋतम्) ब्रह्म सत्य वा यज्ञ को (यते) प्राप्त होने के लिये तुम लोगों को (अत्र) इस मार्ग में (अवखादः) भय (नास्ति) कभी नहीं होता ॥४॥
Essence
मनुष्यों को भूमि समुद्र अन्तरिक्ष में रथ नौका विमानों के लिये सरल दृढ़ कण्टक चोर डाकू भय आदि दोष रहित मार्गों को संपादन करना चाहिये जहां किसी को कुछ भी दुःख वा भय न होवे इन सब को सिद्ध करके अखण्ड चक्रवर्ती राज्य को भोग करना वा कराना चाहिये ॥४॥
Subject
फिर वे क्या सिद्ध करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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