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Rigveda Mandal 1 / Sukta 41 / Mantra 3

191 Sukta
9 Mantra
1/41/3
Devata- वरुणमित्रार्यमणः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि दु॒र्गा वि द्विषः॑ पु॒रो घ्नन्ति॒ राजा॑न एषाम् । नय॑न्ति दुरि॒ता ति॒रः ॥

वि । दुः॒ऽगा । वि । द्विषः॑ । पु॒रः । घ्नन्ति॑ । राजा॑नः । ए॒षा॒म् । नय॑न्ति । दुः॒ऽइ॒ता । ति॒रः ॥

Mantra without Swara
वि दुर्गा वि द्विषः पुरो घ्नन्ति राजान एषाम् । नयन्ति दुरिता तिरः ॥

वि । दुःगा । वि । द्विषः । पुरः । घ्नन्ति । राजानः । एषाम् । नयन्ति । दुःइता । तिरः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 22 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
जो (राजानः) उत्तम कर्म वा गुणों से प्रकाशमान राजा लोग (एषाम्) इन शत्रुओं के (दुर्गा) दुःख से जाने योग्य प्रकोटों और (पुरः) नगरों को (घ्नन्ति) छिन्न-भिन्न करते और (द्विषः) शत्रुओं को (तिरोनयन्ति) नष्ट कर देते हैं, वे चक्रवर्त्ति राज्य को प्राप्त होने को समर्थ होते हैं ॥३॥
Essence
जो अन्याय करनेवाले मनुष्य धार्मिक मनुष्यों को पीड़ा देकर दुर्ग में रहते और फिर आकर दुःखी करते हों उनको नष्ट और श्रेष्ठों के पालन करने के लिये विद्वान् धार्मिक राजा लोगों को चाहिये कि उनके प्रकोट और नगरों का विनाश और शत्रुओं को छिन्न-भिन्न मार और वशीभूत करके धर्म से राज्य का पालन करें ॥३॥
Subject
फिर वे राजप्रजा पुरुष क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।