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Rigveda Mandal 1 / Sukta 40 / Mantra 8

191 Sukta
8 Mantra
1/40/8
Devata- बृहस्पतिः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
उप॑ क्ष॒त्रं पृ॑ञ्ची॒त हन्ति॒ राज॑भिर्भ॒ये चि॑त्सुक्षि॒तिं द॑धे । नास्य॑ व॒र्ता न त॑रु॒ता म॑हाध॒ने नार्भे॑ अस्ति व॒ज्रिणः॑ ॥

उप॑ । क्ष॒त्रम् । पृ॒ञ्ची॒त । हन्ति॑ । राज॑ऽभिः । भ॒ये । चि॒त् । सु॒ऽक्षि॒तिम् । द॒धे॒ । न । अ॒स्य॒ । व॒र्ता । न । त॒रु॒ता । म॒हा॒ऽध॒ने । न । अर्भे॑ । अ॒स्ति॒ । व॒ज्रिणः॑ ॥

Mantra without Swara
उप क्षत्रं पृञ्चीत हन्ति राजभिर्भये चित्सुक्षितिं दधे । नास्य वर्ता न तरुता महाधने नार्भे अस्ति वज्रिणः ॥

उप । क्षत्रम् । पृञ्चीत । हन्ति । राजभिः । भये । चित् । सुक्षितिम् । दधे । न । अस्य । वर्ता । न । तरुता । महाधने । न । अर्भे । अस्ति । वज्रिणः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 21 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो मनुष्य (क्षत्रम्) राज्य को (पृञ्चीत) संबन्ध तथा (सुक्षितिम्) उत्तमोत्तम भूमि की प्राप्ति करानेवाले व्यवहार को (दधे) धारण करता है (अस्य) इस सर्व सभाध्यक्ष (वज्रिणः) बली के (राजभिः) रजपूतों के साथ (भये) युद्ध भीति में अपने मनुष्यों को कोई भी शत्रु (न) नहीं (हन्ति) मार सकता (न) (महाधने) नहीं महाधन की प्राप्ति के हेतु बड़े युद्ध में (वर्त्ता) विपरीत वर्त्तनेवाला और (न) इस वीर्यवाले के समीप (अर्भे) छोटे युद्ध में (चित्) भी (तरुता) बल को उल्लंघन करनेवाला कोई (अस्ति) होता है ॥८॥
Essence
जो रजपूत लोग महाधन की प्राप्ति के निमित्त बड़े युद्ध वा थोड़े युद्ध में शत्रुओं को जीत वा बांध के निवारण करने और धर्म से प्रजा का पालन करने को समर्थ होते हैं वे इस संसार में आनन्द को भोग कर परलोक में भी बड़े भारी आनन्द को भोगते हैं ॥८॥ अब उनतालीसवें सूक्त में कहे हुए विद्वानों के कार्यरूप अर्थ के साथ ब्रह्मणस्पति आदि शब्दों के अर्थों के संबंध से पूर्वसूक्त की संगति जाननी चाहिये ॥८॥ यह चालीसवां सूक्त और इक्कीसवां वर्ग समाप्त हुआ ॥४०।२१॥
Subject
ऐसे विद्वान् का कैसा राज्य होता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।