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Rigveda Mandal 1 / Sukta 4 / Mantra 8

191 Sukta
10 Mantra
1/4/8
Devata- इन्द्र: Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒स्य पी॒त्वा श॑तक्रतो घ॒नो वृ॒त्राणा॑मभवः। प्रावो॒ वाजे॑षु वा॒जिन॑म्॥

अ॒स्य । पी॒त्वा । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो । घ॒नः । वृ॒त्राणा॑म् । अ॒भ॒वः॒ । प्र । आ॒वः॒ । वाजे॑षु । वा॒जिन॑म् ॥

Mantra without Swara
अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभवः। प्रावो वाजेषु वाजिनम्॥

अस्य। पीत्वा। शतक्रतो इति शतऽक्रतो। घनः। वृत्राणाम्। अभवः। प्र। आवः। वाजेषु। वाजिनम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 8 Mantra » 3

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Meaning
हे पुरुषोत्तम ! जैसे यह (घनः) मूर्त्तिमान् होके सूर्य्यलोक (अस्य) जलरस को (पीत्वा) पीकर (वृत्राणाम्) मेघ के अङ्गरूप जलबिन्दुओं को वर्षाके सब ओषधी आदि पदार्थों को पुष्ट करके सब की रक्षा करता है, वैसे ही हे (शतक्रतो) असंख्यात कर्मों के करनेवाले शूरवीरो ! तुम लोग भी सब रोग और धर्म के विरोधी दुष्ट शत्रुओं के नाश करनेहारे होकर (अस्य) इस जगत् के रक्षा करनेवाले (अभवः) हूजिये। इसी प्रकार जो (वाजेषु) दुष्टों के साथ युद्ध में प्रवर्त्तमान धार्मिक और (वाजिनम्) शूरवीर पुरुष है, उसकी (प्रावः) अच्छी प्रकार रक्षा सदा करते रहिये॥८॥
Essence
इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जो मनुष्य दुष्टों के साथ धर्मपूर्वक युद्ध करता है, उसी का ही विजय होता है और का नहीं। तथा परमेश्वर भी धर्मपूर्वक युद्ध करनेवाले मनुष्यों का ही सहाय करनेवाला होता है, औरों का नहीं॥८॥
Subject
फिर भी परमेश्वर ने सूर्य्यलोक के स्वभाव का प्रकाश अगले मन्त्र में किया है-

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