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Rigveda Mandal 1 / Sukta 4 / Mantra 5

191 Sukta
10 Mantra
1/4/5
Devata- इन्द्र: Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒त ब्रु॑वन्तु नो॒ निदो॒ निर॒न्यत॑श्चिदारत। दधा॑ना॒ इन्द्र॒ इद्दुवः॑॥

उ॒त । ब्रु॒व॒न्तु॒ । नः॒ । निदः॑ । निः । अ॒न्यतः॑ । चित् । आ॒र॒त॒ । दधा॑नाः । इन्द्रे॑ । इत् । दुवः॑ ॥

Mantra without Swara
उत ब्रुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत। दधाना इन्द्र इद्दुवः॥

उत। ब्रुवन्तु। नः। निदः। निः। अन्यतः। चित्। आरत। दधानाः। इन्द्रे। इत्। दुवः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 7 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो कि परमेश्वर की (दुवः) सेवा को धारण किये हुए, सब विद्या धर्म और पुरुषार्थ में वर्त्तमान हैं, वे ही (नः) हम लोगों के लिये सब विद्याओं का उपदेश करें, और जो कि (चित्) नास्तिक (निदः) निन्दक वा धूर्त मनुष्य हैं, वे सब हम लोगों के निवासस्थान से (निरारत) दूर चले जावें, किन्तु (उत) निश्चय करके और देशों से भी दूर हो जायें अर्थात् अधर्मी पुरुष किसी देश में न रहें॥५॥
Essence
सब मनुष्यों को उचित है कि आप्त धार्मिक विद्वानों का सङ्ग कर और मूर्खों के सङ्ग को सर्वथा छोड़ के ऐसा पुरुषार्थ करना चाहिये कि जिससे सर्वत्र विद्या की वृद्धि, अविद्या की हानि, मानने योग्य श्रेष्ठ पुरुषों का सत्कार दुष्टों को दण्ड, ईश्वर की उपासना आदि शुभ कर्मों की वृद्धि और अशुभ कर्मों का विनाश नित्य होता रहे॥५॥
Subject
ईश्वर ने फिर भी इसी विषय का उपदेश मन्त्र में किया है-