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Rigveda Mandal 1 / Sukta 39 / Mantra 9

191 Sukta
10 Mantra
1/39/9
Devata- मरूतः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- पथ्यावृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
असा॑मि॒ हि प्र॑यज्यवः॒ कण्वं॑ द॒द प्र॑चेतसः । असा॑मिभिर्मरुत॒ आ न॑ ऊ॒तिभि॒र्गन्ता॑ वृ॒ष्टिं न वि॒द्युतः॑ ॥

असा॑मि । हि । प्र॒ऽय॒ज्य॒वः॒ । कण्व॑म् । द॒द । प्र॒ऽचे॒त॒सः॒ । असा॑मिऽभिः । म॒रु॒तः॒ । आ । नः॒ । ऊ॒तिऽभिः॑ । गन्त॑ । वृ॒ष्टिम् । न । वि॒ऽद्युतः॑ ॥

Mantra without Swara
असामि हि प्रयज्यवः कण्वं दद प्रचेतसः । असामिभिर्मरुत आ न ऊतिभिर्गन्ता वृष्टिं न विद्युतः ॥

असामि । हि । प्रयज्यवः । कण्वम् । दद । प्रचेतसः । असामिभिः । मरुतः । आ । नः । ऊतिभिः । गन्त । वृष्टिम् । न । विद्युतः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 19 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (प्रयज्यवः) अच्छे प्रकार परोपकार करने (प्रचेतसः) उत्तम ज्ञानयुक्त (मरुतः) विद्वान् लोगो ! तुम (असामिभिः) नाशरहित (ऊतिभिः) रक्षा सेना आदि से (न) जैसे (विद्युतः) सूर्य बिजुली आदि (वृष्टिम्) वर्षा कर सुखी करते हैं वैसे (नः) हम लोगों को (असामि) अखंडित सुख (दद) दीजिये (हि) निश्चय से दुष्ट शत्रुओं को जीतने के वास्ते (कण्वम्) और आप्त विद्वान् के समीप नित्य (आगन्त) अच्छे प्रकार जाया कीजिये ॥९॥
Essence
इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे पवन सूर्य बिजुली आदि वर्षा करके सब प्राणियों के सुख के लिये अनेक प्रकार के फल, पत्र, पुष्प, अन्न आदि को उत्पन्न करते हैं वैसे विद्वान् लोग भी सब प्राणीमात्र को वेद विद्या देकर उत्तम-२ सुखों को निरन्तर संपादन करें ॥९॥
Subject
फिर उनसे शोधे वा प्रेरे हुए वे क्या२ करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।