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Rigveda Mandal 1 / Sukta 39 / Mantra 8

191 Sukta
10 Mantra
1/39/8
Devata- मरूतः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- विराट्सतःपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यु॒ष्मेषि॑तो मरुतो॒ मर्त्ये॑षित॒ आ यो नो॒ अभ्व॒ ईष॑ते । वि तं यु॑योत॒ शव॑सा॒ व्योज॑सा॒ वि यु॒ष्माका॑भिरू॒तिभिः॑ ॥

यु॒ष्माऽइ॑षि॑तः । म॒रु॒तः॒ । मर्त्य॑ऽइषितः । आ । यः । नः॒ । अभ्वः॑ । ईष॑ते । वि । तम् । यु॒यो॒त॒ । शव॑सा । वि । ओज॑सा । वि । यु॒ष्माका॑भिः । ऊ॒तिऽभिः॑ ॥

Mantra without Swara
युष्मेषितो मरुतो मर्त्येषित आ यो नो अभ्व ईषते । वि तं युयोत शवसा व्योजसा वि युष्माकाभिरूतिभिः ॥

युष्माइषितः । मरुतः । मर्त्यइषितः । आ । यः । नः । अभ्वः । ईषते । वि । तम् । युयोत । शवसा । वि । ओजसा । वि । युष्माकाभिः । ऊतिभिः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 19 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) विद्वानों ! तुम (यः) जो (अभ्वः) विरोधी मित्र भाव रहित (युष्मेषितः) तुम लोगों को जीतने और (मर्त्येषितः) मनुष्यों से विजय की इच्छा करनेवाला शत्रु (नः) हम लोगों को (ईषते) मारता है उसको (शवसा) बलयुक्त सेना वा (व्योजसा) अनेक प्रकार के पराक्रम और (युष्माकाभिः) तुम्हारी कृपापात्र (ऊतिभिः) रक्षा प्रीति तृप्ति ज्ञान आदिकों से युक्त सेनाओं से (वियुयोत) विशेषता से दूर कर दीजिये ॥८॥
Essence
मनुष्यों को उचित है कि जो स्वार्थी परोपकार से रहित दूसरे को पीड़ा देने में अत्यन्त प्रसन्न शत्रु हैं उनको विद्या वा शिक्षा के द्वारा खोटे कर्मों से निवृत्त कर वा उत्तम सेना बल को संपादन युद्ध से जीत निवारण करके सबके हित का विस्तार करना चाहिये ॥८॥
Subject
फिर तुमको उनसे क्या सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।