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Rigveda Mandal 1 / Sukta 39 / Mantra 5

191 Sukta
10 Mantra
1/39/5
Devata- मरूतः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- पथ्यावृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
प्र वे॑पयन्ति॒ पर्व॑ता॒न्वि वि॑ञ्चन्ति॒ वन॒स्पती॑न् । प्रो आ॑रत मरुतो दु॒र्मदा॑इव॒ देवा॑सः॒ सर्व॑या वि॒शा ॥

प्र । वे॒प॒य॒न्ति॒ । पर्व॑तान् । वि । वि॒ञ्च॒न्ति॒ । वन॒स्पती॑न् । प्रो इति॑ । आ॒र॒त॒ । म॒रु॒तः॒ । दु॒र्मदाः॑ऽइव । देवा॑सः । सर्व॑या । वि॒शा ॥

Mantra without Swara
प्र वेपयन्ति पर्वतान्वि विञ्चन्ति वनस्पतीन् । प्रो आरत मरुतो दुर्मदाइव देवासः सर्वया विशा ॥

प्र । वेपयन्ति । पर्वतान् । वि । विञ्चन्ति । वनस्पतीन् । प्रो इति । आरत । मरुतः । दुर्मदाःइव । देवासः । सर्वया । विशा॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 18 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) वायुवत् बलिष्ठ और प्रिय (देवासः) न्यायाधीश सेनापति सभाध्यक्ष विद्वान् लोगो ! तुम जैसे वायु (वनस्पतीन्) वड़ और पिप्पल आदि वनस्पतियों को (प्रवेपयन्ति) कंपाते और जैसे (पर्वतान्) मेघों को (विविचंति) पृथक-२ कर देते हैं वैसे (दुर्मदा इव) मदोन्मत्तों के समान वर्त्तते हुए शत्रुओं को युद्ध से (प्रो आरत) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये और (सर्वया) सब (विशा) प्रजा के साथ सुख से वर्त्तिये ॥५॥
Essence
इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे राजधर्म में वर्त्तनेवाले विद्वान् लोग दंड से घमंडी डाकुओं को वश में करके धर्मात्मा प्रजाओं का पालन करते हैं वैसे तुम भी अपनी प्रजा का पालन करो और जैसे पवन भूगोल के चारों ओर विचरते हैं वैसे आप लोग सर्वत्र जाओ-आओ। यह अठारवां वर्ग समाप्त हुआ ॥५॥
Subject
फिर वे कैसे कर्म्म करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।