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Rigveda Mandal 1 / Sukta 39 / Mantra 2

191 Sukta
10 Mantra
1/39/2
Devata- मरूतः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- विराट्सतःपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स्थि॒रा वः॑ स॒न्त्वायु॑धा परा॒णुदे॑ वी॒ळू उ॒त प्र॑ति॒ष्कभे॑ । यु॒ष्माक॑मस्तु॒ तवि॑षी॒ पनी॑यसी॒ मा मर्त्य॑स्य मा॒यिनः॑ ॥

स्थि॒रा । वः॒ । स॒न्तु॒ । आयु॑धा । प॒रा॒ऽनुदे॑ । वी॒ळु । उ॒त । प्र॒ति॒ऽस्कभे॑ । यु॒ष्माक॑म् । अ॒स्तु॒ । तवि॑षी । पनी॑यसी । मा । मर्त्य॑स्य । मा॒यिनः॑ ॥

Mantra without Swara
स्थिरा वः सन्त्वायुधा पराणुदे वीळू उत प्रतिष्कभे । युष्माकमस्तु तविषी पनीयसी मा मर्त्यस्य मायिनः ॥

स्थिरा । वः । सन्तु । आयुधा । परानुदे । वीळु । उत । प्रतिस्कभे । युष्माकम् । अस्तु । तविषी । पनीयसी । मा । मर्त्यस्य । मायिनः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 18 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे धार्मिक मनुष्यो ! (वः) तुम्हारे (आयुधा) आग्नेय आदि अस्त्र और तलवार, धनुष् बाण, भुसुंडी (बन्दूक) शतघ्नी (तोप) आदि शस्त्र अस्त्र (पराणुदे) शत्रुओं को व्यथा करनेवाले युद्ध (उत) और (प्रतिष्कमे) रोकने बांधने और मारने रूप कर्मों के लिये (स्थिरा) स्थिर दृढ़ चिरस्थायी (वीळू) दृढ़ बड़े-२ उत्तम युक्त (तविषी) प्रशस्त सेना (पनीयसी) अतिशय करके स्तुति करने योग्य व व्यवहार को सिद्ध करनेवाली (अस्तु) हो और पूर्वोक्त पदार्थ (मायिनः) कपट आदि अधर्माचरण युक्त (मर्त्यस्य) दुष्ट मनुष्यों के (मा) कभी मत हों ॥२॥
Essence
धार्मिक मनुष्य ही परमात्मा के कृपा पात्र होकर सदा विजय को प्राप्त होते हैं दुष्ट नहीं। परमात्मा भी धार्मिक मनुष्यों ही को आशीर्वाद देता है पापियों को नहीं। पुण्यात्मा मनुष्यों को उचित है कि उत्तम-२ शस्त्र-अस्त्र रचकर उनके फेंकने का अभ्यास करके सेना को उत्तम शिक्षा देकर शत्रुओं का निरोध वा पराजय करके न्याय से मनुष्यों की निरन्तर रक्षा करनी चाहिये ॥२॥ सं० भा० के अनुसार इसके आगे इन शस्त्रादि पदार्थों को छली मनुष्य नहीं प्राप्त कर सक्ता इतना वाक्य और होना चाहिये। सं०
Subject
अब ईश्वर इनको उपदेश और आशीर्वाद देकर सबसे कहता है, कि तुमको क्या-२ सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।