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Rigveda Mandal 1 / Sukta 39 / Mantra 10

191 Sukta
10 Mantra
1/39/10
Devata- मरूतः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- विराट्सतःपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
असा॒म्योजो॑ बिभृथा सुदान॒वोऽसा॑मि धूतयः॒ शवः॑ । ऋ॒षि॒द्विषे॑ मरुतः परिम॒न्यव॒ इषुं॒ न सृ॑जत॒ द्विष॑म् ॥

असा॒मि । ओजः॑ । बि॒भृ॒थ॒ । सु॒ऽदा॒न॒वः॒ । असा॑मि । धू॒त॒यः॒ । शवः॑ । ऋ॒षि॒ऽद्विषे॑ । म॒रु॒तः॒ । प॒रि॒ऽम॒न्यवे॑ । इषु॑म् । न । सृ॒ज॒त॒ । द्विष॑म् ॥

Mantra without Swara
असाम्योजो बिभृथा सुदानवोऽसामि धूतयः शवः । ऋषिद्विषे मरुतः परिमन्यव इषुं न सृजत द्विषम् ॥

असामि । ओजः । बिभृथ । सुदानवः । असामि । धूतयः । शवः । ऋषिद्विषे । मरुतः । परिमन्यवे । इषुम् । न । सृजत । द्विषम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 19 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (धूतयः) दुष्टों को कंपाने (सुदानवः) उत्तम दान स्वभाववाले (मरुतः) विद्वान् लोगो ! तुम (न) जैसे (परिमन्यवः) सब प्रकार क्रोधयुक्त शूरवीर मनुष्य (द्विषम्) शत्रु के प्रति (इषुम्) बाण आदि शस्त्र समूहों को छोड़ते हैं वैसे (ऋषिद्विषे) वेद वेदों को जाननेवाले और ईश्वर के विरोधी दुष्ट मनुष्यों के लिये (असामि) अखिल (ओजः) विद्या पराक्रम (असामि) संपूर्ण (शवः) बल को (बिभृथ) धारण करो और उस शत्रु के प्रति शस्त्र वा अस्त्रों को (सृजत) छोड़ो ॥१०॥
Essence
इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे धार्मिक शूरवीर मनुष्य क्रोध को उत्पन्न शस्त्रों के प्रहारों से शत्रुओं को जीत निष्कंटक राज्य को प्राप्त होकर प्रजा को सुखी करते हैं वैसे ही सब मनुष्य वेद विद्वान् वा ईश्वर के विरोधियों के प्रति सम्पूर्ण बल पराक्रमों से शस्त्र अस्त्रों को छोड़ उन को जीतकर ईश्वर वेद विद्या और विद्वान् युक्त राज्य को संपादन करें ॥१०॥ इस सूक्त में वायु और विद्वानों के गुण वर्णन करने से पूर्व सूक्तार्थ के साथ इस सूक्त के अर्थ की संगति जाननी चाहिये। यह उनतालीसवां सूक्त और उन्नीसवां वर्ग समाप्त हुआ ॥३९॥१९॥
Subject
फिर वे क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।