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Rigveda Mandal 1 / Sukta 38 / Mantra 8

191 Sukta
15 Mantra
1/38/8
Devata- मरूतः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वा॒श्रेव॑ वि॒द्युन्मि॑माति व॒त्सं न मा॒ता सि॑षक्ति । यदे॑षां वृ॒ष्टिरस॑र्जि ॥

वा॒श्राऽइ॑व । वि॒ऽद्युत् । मि॒मा॒ति॒ । व॒त्सम् । न । मा॒ता । सि॒ष॒क्ति॒ । य॒त् । ए॒षा॒म् । वृ॒ष्टिः । अस॑र्जि ॥

Mantra without Swara
वाश्रेव विद्युन्मिमाति वत्सं न माता सिषक्ति । यदेषां वृष्टिरसर्जि ॥

वाश्राइव । विद्युत् । मिमाति । वत्सम् । न । माता । सिषक्ति । यत् । एषाम् । वृष्टिः । असर्जि॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 16 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! आप लोग (यत्) जो (एषाम्) इन वायुओं के योग से उत्पन्न हुई (विद्युत्) बिजुली (वाश्रेव) जैसे गौ अपने (वत्सम्) बछड़े को इच्छा करती हुई सेवन करती है वैसे (मिहम्‡) वृष्टि को (मिमाति) उत्पन्न करती और इच्छा करती हुई (माता) मान्य देनेवाली माता पुत्र का दूध से (सिवक्ति न) जैसे सींचती है वैसे पदार्थों को सेवन करती है जो (वृष्टिः) वर्षा को (असर्जि) करती है वैसे शुभ गुण कर्मों से एक दूसरों के सुख करने हारे हूजिये ॥८॥ ‡मिहम् इत्यस्य पूर्व मन्त्रादनुवृत्तिरायाति। सं०
Essence
इस मंत्र में दो उपमालङ्कार है। हे विद्वान् मनुष्यो ! तुम लोगों को उचित है कि जैसे अपने-२ बछड़ों को सेवन करने के लिये इच्छा करती हुई गौ और अपने छोटे बालक को सेवने हारी माता ऊंचे स्वर से शब्द करके उनकी ओर दौड़ती हैं वैसे ही बिजुली बड़े-२ शब्दों को करती हुई मेघ के अवयवों के सेवन करने के लिये दौड़ती है ॥८॥
Subject
ये मनुष्य किसके समान क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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