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Rigveda Mandal 1 / Sukta 38 / Mantra 5

191 Sukta
15 Mantra
1/38/5
Devata- मरूतः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मा वो॑ मृ॒गो न यव॑से जरि॒ता भू॒दजो॑ष्यः । प॒था य॒मस्य॑ गा॒दुप॑ ॥

मा । वः॒ । मृ॒गः । न । यव॑से । ज॒रि॒ता । भू॒त् । अजो॑ष्यः । प॒था । य॒मस्य॑ । गा॒त् । उप॑ ॥

Mantra without Swara
मा वो मृगो न यवसे जरिता भूदजोष्यः । पथा यमस्य गादुप ॥

मा । वः । मृगः । न । यवसे । जरिता । भूत् । अजोष्यः । पथा । यमस्य । गात् । उप॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 15 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजा और प्रजा के जनों ! आप लोग (न) जैसे (मृगः) हिरन (यवसे) खाने योग्य घास खाने के निमित्त प्रवृत्त होता है वैसे (वः) तुम्हारा (जरिता) विद्याओं का दाता (अजोष्यः) असेवनीय अर्थात् पृथक् (मा भूत्) न होवे तथा (यमस्य) निग्रह करनेवाले वायु के (पथा) मार्ग से (मोप गात्) कभी अल्पायु होकर मृत्यु को प्राप्त न होवे, वैसा काम किया करो ॥५॥
Essence
इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे हिरन युक्ति से निरन्तर घास खा-कर सुखी होते हैं वैसे प्राण वायु की विद्या को जाननेवाला मनुष्य युक्ति के साथ अहार-विहार कर वायु के ¤मार्ग से अर्थात् मृत्यु को प्राप्त नहीं होता और संपूर्ण अवस्था को भोग के सुख से शरीर को छोड़ता है ¶अर्थात् सदा विद्या पढ़ें पढ़ावें कभी विद्यार्थी और आचार्य वियुक्त न हों और प्रमाद करके अल्पायु में न मर जायें ॥५॥ ¤सं० भा० के अनुसार मार्ग को।सं० ¶इसमें आगे का भाग संस्कृत भाष्य में नहीं है। सं०
Subject
उन वायुओं के संबंध से जीव को क्या होता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।