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Rigveda Mandal 1 / Sukta 38 / Mantra 4

191 Sukta
15 Mantra
1/38/4
Devata- मरूतः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यद्यू॒यं पृ॑श्निमातरो॒ मर्ता॑सः॒ स्यात॑न । स्तो॒ता वो॑ अ॒मृतः॑ स्यात् ॥

यत् । यू॒यम् । पृ॒श्नि॒ऽमा॒त॒रः॒ । मर्ता॑सः । स्यात॑न । स्तो॒ता । वः॒ । अ॒मृतः॑ । स्यात् ॥

Mantra without Swara
यद्यूयं पृश्निमातरो मर्तासः स्यातन । स्तोता वो अमृतः स्यात् ॥

यत् । यूयम् । पृश्निमातरः । मर्तासः । स्यातन । स्तोता । वः । अमृतः । स्यात्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 15 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पृश्निमातरः) जिन वायुओं का माता आकाश है उनके सदृश (मर्त्तासः) मरणधर्म युक्त राजा और प्रजा के पुरुषों ! आप पुरुषार्थ युक्त (यत्) जो अपने-२ कामों में (स्यातन) हों तो (वः) तुम्हारी रक्षा करनेवाला सभाध्यक्ष राजा (अमृतः) अमृत सुखयुक्त स्यात् होवें ॥४॥
Essence
राजा और प्रजा के पुरुषों को उचित है कि आलस्य छोड़ वायु के समान अपने-२ कामों में नियुक्त होवें, जिससे सब का रक्षक सभाध्यक्ष राजा शत्रुओं से मारा नहीं जा सकता+ ॥४॥ +स० भा० के अनुसार सके। सं०
Subject
फिर वे राजपुरुष कैसे होने चाहियें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।