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Rigveda Mandal 1 / Sukta 38 / Mantra 15

191 Sukta
15 Mantra
1/38/15
Devata- मरूतः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वन्द॑स्व॒ मारु॑तं ग॒णं त्वे॒षं प॑न॒स्युम॒र्किण॑म् । अ॒स्मे वृ॒द्धा अ॑सन्नि॒ह ॥

वन्द॑स्व । मारु॑तम् । ग॒णम् । त्वे॒षम् । प॒न॒स्युम् । अ॒र्किण॑म् । अ॒स्मे इति॑ । वृ॒द्धाः । अ॒स॒न् । इ॒ह ॥

Mantra without Swara
वन्दस्व मारुतं गणं त्वेषं पनस्युमर्किणम् । अस्मे वृद्धा असन्निह ॥

वन्दस्व । मारुतम् । गणम् । त्वेषम् । पनस्युम् । अर्किणम् । अस्मे इति । वृद्धाः । असन् । इह॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 17 Mantra » 5

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Meaning
हे विद्वान् मनुष्य ! तू जैसे (इह) इस सब व्यवहार में (अस्मे) हम लोगों के मध्य में (वृद्धाः) बड़ी विद्या और आयु से युक्त वृद्ध पुरुष सत्याचरण करनेवाले (असन्) होवें वैसे (अर्किणम्) प्रशंसनीय (त्वेषम्) अग्नि आदि प्रकाशवान् द्रव्यों से युक्त (पनस्युम्) अपने आत्मा के व्यवहार की इच्छा के हेतु (मारुतम्) वायु के इस (गणम्) समूह की (वन्दस्व) कामना कर ॥१५॥
Essence
इस मंत्र में लुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे पवन कार्यों को सिद्ध करने के साधन होने से सुख देनेवाले होते हैं वैसे विद्या और अपने पुरुषार्थ से सुख किया करें ॥१५॥ इस सूक्त में वायु के दृष्टान्त से विद्वानों के गुण वर्णन करने से पूर्व सूक्त के साथ इस सूक्त की संगति जाननी चाहिये यह सत्रहवां वर्ग और अड़तीसवां सूक्त समाप्त हुआ ॥३८॥
Subject
फिर वह विद्वान् क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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