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Rigveda Mandal 1 / Sukta 38 / Mantra 13

191 Sukta
15 Mantra
1/38/13
Devata- मरूतः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अच्छा॑ वदा॒ तना॑ गि॒रा ज॒रायै॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॑म् । अ॒ग्निं मि॒त्रं न द॑र्श॒तम् ॥

अच्छ॑ । व॒द॒ । तना॑ । गि॒रा । ज॒रायै॑ । ब्रह्म॑णः । पति॑म् । अ॒ग्निम् । मि॒त्रम् । न । द॒र्श॒तम् ॥

Mantra without Swara
अच्छा वदा तना गिरा जरायै ब्रह्मणस्पतिम् । अग्निं मित्रं न दर्शतम् ॥

अच्छ । वद । तना । गिरा । जरायै । ब्रह्मणः । पतिम् । अग्निम् । मित्रम् । न । दर्शतम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 17 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे सब विद्या के जाननेवाले विद्वान् ! तू (न) जैसे (ब्रह्मणः) वेद के पढ़ाने और उपदेश से (पतिम्) पालने हारे (दर्शतम्) देखने योग्य (अग्निम्) तेजस्वी (मित्रम्) जैसे मित्र को मित्र उपदेश करता है वैसे (जरायै) गुण ज्ञान के लिये (तना) गुणों के प्रकाश को बढ़ाने हारी (गिरा) अपनी वेदयुक्त वाणी से विमानादि यानविद्या का (अच्छा वद) अच्छे प्रकार उपदेश कर ॥१३॥
Essence
इस मंत्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वान् मनुष्यों ! तुम लोगों को चाहिये कि जैसे प्रिय मित्र अपने प्रिय तेजस्वी वेदोपदेशक मित्र को सेवा और गुणों की स्तुति से तृप्त करता है वैसे सब विद्याओं का विस्तार करनेवाली वेद वाणी से विमानादि यानों के रचने की विद्या का उसके गुण ज्ञान के लिये निरंतर उपदेश करो ॥१३॥
Subject
फिर इस विमानादि विद्या का उपदेशक विद्वान् कैसा होवे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।