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Rigveda Mandal 1 / Sukta 38 / Mantra 11

191 Sukta
15 Mantra
1/38/11
Devata- मरूतः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मरु॑तो वीळुपा॒णिभि॑श्चि॒त्रा रोध॑स्वती॒रनु॑ । या॒तेमखि॑द्रयामभिः ॥

मरु॑तः । वी॒ळु॒पा॒णिऽभिः॑ । चि॒त्राः । रोध॑स्वतीः । अनु॑ । या॒त । ई॒म् । अखि॑द्रयामऽभिः ॥

Mantra without Swara
मरुतो वीळुपाणिभिश्चित्रा रोधस्वतीरनु । यातेमखिद्रयामभिः ॥

मरुतः । वीळुपाणिभिः । चित्राः । रोधस्वतीः । अनु । यात । ईम् । अखिद्रयामभिः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 17 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) योगाभ्यासी योग व्यवहार सिद्धि चाहनेवाले पुरुषो ! तुम लोग (अखिद्रयामभिः) निरन्तर गमनशील (वीळुपाणिभिः) दृढ़ बलरूप ग्रहण के साधक व्यवहारवाले पवनों के साथ (रोधस्वतीः) बहुत प्रकार के बांध वा आवरण और (चित्राः) आश्चर्य्य गुणवाली नदी वा नाडियों के (ईम्) (अनु) अनुकूल (यात्) प्राप्त हों ॥११॥
Essence
पवनों में गमन बल और व्यवहार होने के हेतु स्वाभाविक धर्म हैं और ये निश्चय करके नदियों को चलानेवाले नाड़ियों के मध्य में गमन करते हुए रुधिर रसादि को शरीर के अवयवों में प्राप्त करते हैं इस कारण योगी लोग योगाभ्यास और अन्य मनुष्य बल आदि के साधनरूप वायुओं से बड़े-२ उपकार ग्रहण करें ॥११॥
Subject
फिर वे मनुष्य पवनों से क्या करते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।