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Rigveda Mandal 1 / Sukta 37 / Mantra 9

191 Sukta
15 Mantra
1/37/9
Devata- मरूतः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स्थि॒रं हि जान॑मेषां॒ वयो॑ मा॒तुर्निरे॑तवे । यत्सी॒मनु॑ द्वि॒ता शवः॑ ॥

स्थि॒रम् । हि । जान॑म् । ए॒षा॒म् । वयः॑ । मा॒तुः । निःऽए॑तवे । यत् । सी॒म् । अनु॑ । द्वि॒ता । शवः॑ ॥

Mantra without Swara
स्थिरं हि जानमेषां वयो मातुर्निरेतवे । यत्सीमनु द्विता शवः ॥

स्थिरम् । हि । जानम् । एषाम् । वयः । मातुः । निःएतवे । यत् । सीम् । अनु । द्विता । शवः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 13 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (एषाम्) इन (वायूनाम्) पवनों का (यत्) जो (स्थिरम्) निश्चल (जानम्) जन्मस्थान आकाश (शवः) बल और जिस में (द्विता) शब्द और स्पर्श गुण का योग है जिसके आश्रय से (वयः) पक्षी (मातुः) अन्तरिक्ष के बीच में (सीम्) सब प्रकार (निरेतवे) निरन्तर जाने आने को समर्थ होते हैं उन वायुओं को आप लोग (अनु) पश्चात् विशेषता से जानिये ॥९॥
Essence
ये कार्यरूप पवन आकाश में उत्पन्न होकर इधर उधर जाते-आते हैं, जहां अवकाश है वहां जिनके सब प्रकार गमन का संभव होता और जिनकी अनुकूलता से सब प्राणी जीवन को प्राप्त होकर बलवाले होते हैं उन को युक्ति के साथ तुम लोग सेवन किया करो ॥९॥ मोक्षमूलर की उक्ति है कि सत्य ही है कि पवनों की उत्पत्ति बलवाली तथा उनका सामर्थ्य आकाश से आता है उनका सामर्थ्य द्विगुण वा पुष्कल है। सो यह निष्प्रयोजन है क्योंकि सब द्रव्यों की उत्पत्ति अपने-२ कारण के अनुकूल बलवाली होती है उनके कार्यों में कारण के गुण आते ही हैं और वयः शब्द से पक्षियों का ग्रहण है ॥९॥
Subject
फिर वे वायु कैसे गुणवाले हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।