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Rigveda Mandal 1 / Sukta 37 / Mantra 7

191 Sukta
15 Mantra
1/37/7
Devata- मरूतः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नि वो॒ यामा॑य॒ मानु॑षो द॒ध्र उ॒ग्राय॑ म॒न्यवे॑ । जिही॑त॒ पर्व॑तो गि॒रिः ॥

नि । वः॒ । यामा॑य । मानु॑षः । द॒ध्रे । उ॒ग्राय॑ । म॒न्यवे॑ । जिही॑त । पर्व॑तः । गि॒रिः ॥

Mantra without Swara
नि वो यामाय मानुषो दध्र उग्राय मन्यवे । जिहीत पर्वतो गिरिः ॥

नि । वः । यामाय । मानुषः । दध्रे । उग्राय । मन्यवे । जिहीत । पर्वतः । गिरिः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 13 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे प्रजासेना के मनुष्यो ! जिस सभापति राजा के भय से वायु के बल से (गिरिः) जल को रोकने गर्जना करनेवाले (पर्वतः) मेघ शत्रु लोग (जिहीत) भागते हैं वह (मानुषः) सभाध्यक्ष राजा (वः) तुम लोगों के (यामाय) यथार्थ व्यवहार चलाने और (मन्यवे) क्रोधरूप (उग्राय) तीव्र दण्ड देने के लिये राज्यव्यवस्था को (दध्रे) धारण कर सकता है ऐसा तुम लोग जानो ॥७॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे प्रजा सेनास्थ मनुष्यों तुम लोगों के सब व्यवहार वायु के समान राजव्यवस्था ही से ठीक-२ चल सकते हैं और जब तुम लोग अपने नियमोपनियमों पर नहीं चलते हो तब तुम को सभाध्यक्ष राजा वायु के समान शीघ्र दण्ड देता है और जिसके भय से वायु से मेघों के समान शत्रुजन पलायमान होते हैं उसको तुम लोग पिता के समान जानो ॥७॥ मोक्षमूलर कहते हैं कि हे पवनों आपके आने से मनुष्य का पुत्र अपने आपही नम्र होता है तथा तुम्हारे क्रोध से डर के भागता है। यह उनका कथन व्यर्थ हैं, क्योंकि इस मंत्र में गिरि और पर्वत शब्द से मेघ का ग्रहण किया है। तथा मानुष शब्द का अर्थ धारण क्रिया का कर्त्ता है और न इस मंत्र में बालक के शिर के नमन होने का ग्रहण है। जैसा कि सायणाचार्य का अर्थ व्यर्थ है वैसा ही मोक्षमूलर का भी जानना चाहिये। वेद का करनेवाला ईश्वर ही है मनुष्य नहीं इतनी भी परीक्षा मोक्षमूलर साहिब ने नहीं की पुनः वेदार्थज्ञान की तो क्या ही कथा है ॥७॥
Subject
फिर वे राजा और प्रजाजन कैसे होने चाहियें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।