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Rigveda Mandal 1 / Sukta 37 / Mantra 12

191 Sukta
15 Mantra
1/37/12
Devata- मरूतः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मरु॑तो॒ यद्ध॑ वो॒ बलं॒ जनाँ॑ अचुच्यवीतन । गि॒रीँर॑चुच्यवीतन ॥

मरु॑तः । यत् । ह॒ । वः॒ । बल॑म् । जना॑न् । अ॒चु॒च्य॒वी॒त॒न॒ । गि॒रीन् । अ॒चु॒च्य॒वी॒त॒न॒ ॥

Mantra without Swara
मरुतो यद्ध वो बलं जनाँ अचुच्यवीतन । गिरीँरचुच्यवीतन ॥

मरुतः । यत् । ह । वः । बलम् । जनान् । अचुच्यवीतन । गिरीन् । अचुच्यवीतन॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 14 Mantra » 2

Bhashya

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Meaning
हे (मरुतः) पवनों के समान सेनाध्यक्षादि राजपुरुषो ! तुम लोग (यत्) जिस कारण (वः) तुम्हारा (ह) प्रसिद्ध (बलम्) सेना आदि दृढ़ बल है इसलिये जैसे वायु (गिरीन्) मेघों को (अचुच्यवीतन) इधर-उधर आकाश पृथिवी में घुमाया करते हैं वैसे (जनान्) प्रजा के मनुष्यों को (अचुच्यवीतन) अपने-२ उत्तम व्यवहारों में प्रेरित करो ॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। सभाध्यक्षादि राजपुरुषों को चाहिये कि जैसे वायु मेघों को इधर-उधर घुमा के वर्षाते हैं वैसे ही प्रजा के सब मनुष्यों को न्याय की व्यवस्था से अपने-२ कर्मों में आलस्य छोड़ के सदा नियुक्त करते रहें ॥१२॥ मोक्षमूलर की उक्ति है। हे पवनो ऐसे बल के साथ जैसी आपकी शक्ति है और तुम पुरुष वा पर्वतों को पतन कराने के निमित्त हो सो यह अशुद्ध है, क्योंकि गिरि शब्द से इस मन्त्र में मेघ का ग्रहण है और जन* शब्द से सामान्य गति ¤वाले का ग्रहण है पतनमात्र का नहीं है ॥१२॥ सं० उ० के अनुसार पहाड़ों का नही। इतना और होना चाहिये। सं० *अर्थात् घन कर्मक अचुच्यवीतन शब्द से। सं० ¤वाली क्रिया का। सं०
Subject
फिर वे राजप्रजाजन वायु के समान कर्म करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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