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Rigveda Mandal 1 / Sukta 37 / Mantra 11

191 Sukta
15 Mantra
1/37/11
Devata- मरूतः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्यं चि॑द्घा दी॒र्घं पृ॒थुं मि॒हो नपा॑त॒ममृ॑ध्रम् । प्र च्या॑वयन्ति॒ याम॑भिः ॥

त्यम् । चि॒त् । घ॒ । दी॒र्घम् । पृ॒थुम् । मि॒हः । नपा॑तम् । अमृ॑ध्रम् । प्र । च्य॒व॒य॒न्ति॒ । याम॑ऽभिः ॥

Mantra without Swara
त्यं चिद्घा दीर्घं पृथुं मिहो नपातममृध्रम् । प्र च्यावयन्ति यामभिः ॥

त्यम् । चित् । घ । दीर्घम् । पृथुम् । मिहः । नपातम् । अमृध्रम् । प्र । च्यवयन्ति । यामभिः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 14 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजपुरुषो ! तुम लोग जैसे (मिहः) वर्षा जल से सींचनेवाले पवन (यामभिः) अपने जाने के मार्गों से (घ) ही (त्यम्) उस (नपातम्) जल को न गिराने और (अमृध्रम्) गीला न करनेवाले (पृथुम्) बड़े (चित्) भी (दीर्घम्) स्थूल मेघ को (प्रच्यावयन्ति) भूमि पर गिरा देते हैं वैसे शत्रुओं को गिरा के प्रजा को आनन्दित करो ॥११॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुषों को चाहिये कि जैसे पवन ही मेघ के निमित्त बहुत जल को ऊपर पहुंचा कर परस्पर घिसने से बिजुली को उत्पन्न कर उसे न गिरने योग्य तथा न गीला करने और बड़े आकारवाले मेघ को भूमि में गिराते हैं वैसे ही धर्म विरोधी सब व्यवहारों को छोड़ें और छुड़ावें ॥११॥ मोक्षमूलर की उक्ति है कि वे पवन इस बहुत काल वर्षा कराते हुए अप्रतिबद्ध मेघ के निमित्त और मार्ग के ऊपर गिराने के लिये हैं यह कुछेक अशुद्ध हैं। क्योंकि (मिहः) यह पद पवनों का विशेषण है और इन्होंने मेघ का विशेषण किया है ॥११॥ सं० भा० के अनुसार-मेघ के मार्ग पर गिराने के निमित्त हैं। सं०
Subject
फिर ये राजपुरुष क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।